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18 June 2021

प्रस्तावना संविधान का भाग है या नहीं | Is the Preamble a part of the Constitution or not?

 पिछले लेख में हमने भारतीय संविधान की प्रस्तावना को जानने का प्रयास किया और साथ ही उससे जुड़ी अधिकाधिक बातों की चर्चा की गई है। आप इस लेख को पढ़ने के पूर्व या उपरांत पिछले लेख को अवश्य पढ़ लें।


पिछला लेख :

● प्रस्तावना क्या है? व भारतीय संविधान की प्रस्तावना


यहां आज हम बात करेंगे कि-

 भारतीय संविधान की प्रस्तावना संविधान का भाग है अथवा नहीं ? 

क्या प्रस्तावना भारतीय संविधान का अंग है अथवा नहीं ?


अकसर यह विवाद संविधान के प्रस्तावना के संदर्भ में जुड़ा रहता है कि भारतीय संविधान की जो प्रस्तावना है वह संविधान का अभिन्न अंग (भाग) है या नहीं ? इस विवाद के कुछ मूल कारण हैं जिनके फलस्वरूप ऐसी स्थिति आज के समय मे बनी हुई है। 


विवाद का कारण : 


इस विवाद का मूल कारण यह है कि कई जगह भारतीय लेखों द्वारा संविधान की प्रस्तावना को संविधान का अभिन्न अंग माना जाता है। कभी-कभी न्यायालय द्वारा भी प्रस्तावना को संविधान का भाग नहीं माना जाता और कभी कभी मान लिया जाता है। इस कारण संविधानवेत्ताओं के समक्ष यह असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि प्रस्तावना संविधान का भाग है अथवा नहीं? 


उपरोक्त कारणों के परिणामस्वरूप विद्वानों व आम जनमानस के मस्तिष्क में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या भारतीय संविधान के अंतर्गत सिर्फ वही भाग आते हैं जिनमें अनुच्छेदों और अनुसूचियों का वर्णन है अर्थात क्या अनुच्छेद 1 से अनुच्छेद 395 तक और अनुसूचियों , संशोधनोंं व धाराओं का वर्णन करने वाला हिस्सा ही संविधान का अंग है या संविधान में वो भाग भी आता है , जिसमें कोई भी अनुच्छेद नहीं हैं। 


प्रस्तावना संविधान का भाग है या नहीं : विवाद-


प्रस्तावना संविधान का भाग है अथवा नहीं ? इस प्रश्न को समझने के लिए हमें संविधान सभा के सदस्यों द्वारा प्रस्तावना के प्रति किए गए बर्ताव को याद करने की आवश्यकता है। 

गौरतलब है कि 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया था जो 22 जनवरी 1947 को संविधान सभा द्वारा पारित कर दिया गया। ऐसा माना जाता है कि यही उद्देश्य प्रस्ताव कालांतर में भारतीय संविधान की प्रस्तावना बना। 


प्रस्तावना संबंधी अंतिम प्रस्ताव 17 अक्टूबर, 1949 को प्रस्तुत किया गया था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद ने प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह जो प्रस्तावना है इसे संविधान के एक भाग के रूप में स्वीकृत किया जाय। अर्थात "प्रस्तावना संविधान का महत्वपूर्ण अंग है।" उस समय यह प्रस्ताव 2 नवंबर, 1949 को स्वीकार कर लिया गया तथा संविधान का भाग बन गया। 


Note: ☛ अधिकांशतः किसी अधिनियम की उद्देशिका विधान मंडलों के सदनों में बहस नहीं की जाती या मतदान नहीं होता। किंतु इसके विपरीत हमारे संविधान की उद्देशिका पर संविधान सभा में संविधान के किसी भी अन्य भाग की तरह पूरी बहस हुई थी , उसे विधिवत अधिनियमित तथा अंगीकृत किया गया था। उद्देशिका पर अंतिम मतदान कराते समय संविधान सभा के अध्यक्ष ने कहा था प्रस्ताव यह है कि उद्देशिका संविधान का अंग बने।


इस प्रकार जब हमारे संविधान सभा ने यह मानकर इसे पारित कर दिया की प्रस्तावना संविधान का भाग है , तो इससे स्पष्ट हो जाना चाहिए। किन्तु न्यायपालिका द्वारा कुछ किये गए निर्णयों से इस संबंध में विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गयी। 


गोपालन बनाम मद्रास (1950) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का विचार था कि संविधान की व्याख्या करने में प्रस्तावना न्यायालय के लिए बाध्यकारी नहीं है। 


प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है - (बेरुबाड़ी मामला, 1960)


भारत के संविधान के अनुच्छेद 143(1) के अंतर्गत बेरुवारी मुकदमे में भारत-पाकिस्तान समझौते के प्रसंग के अंतर्गत आठ न्यायाधीशों की पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश बी.पी. सिन्हा ने की, जिसने इस विषय पर विचार किया। न्यायाधीश गजेंद्र गडकर ने सर्वसम्मति की घोषणा कर दी। 

न्यायालय ने निर्णय में कहा कि संविधान की प्रस्तावना निःसंदेह संविधान निर्माताओं ने विभिन्न प्रावधानों से परिलक्षित कर दिया कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है।


 बेरुवारी मुकदमे के निर्णय का संक्षिप्त रूप :


1. संविधान को प्रस्तावना, संविधान निर्माताओं के दिमाग को खोलने की कुँजी हैं, इससे संविधान में शामिल विभिन्न प्रावधानों को स्पष्ट किया जा सके।

2. प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है।

3. यह संविधान के प्रावधानों के द्वारा सरकार को दी गई शक्तियों का स्रोत नहीं है। 

4. इस प्रकार की शक्तियां संविधान में समाविष्ट एवं अंतर्निहित प्रदान कर की गयी हैं।

5. शक्तियों के संबंध में जो सत्य है, वहीं निषेध, सीमांकन व नियंत्रण के विषय में भी सत्य होता है।

6. संविधान की प्रस्तावना का पहला भाग सम्प्रभुत्ता की अवधारणा को सीमित करता। है जब वह सम्प्रभु शक्ति का प्रयोग कर किसी अन्तराष्ट्रीय संधि के द्वारा भारत किसी भूभाग को स्थानांतरित करने पर रोक लगाता है।


बेरुबारी मामला गोलकनाथ मुकदमें पर आधारित रहा। न्यायाधीश वॉनचू के अनुसार, "हम कई समान तर्कों के आधार पर यह विचार रखते हैं कि प्रस्तावना अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन को किसी भी प्रकार से निषिद्ध या नियंत्रित नहीं करती है।"


न्यायमूर्ति बच्छावत का विचार था कि "प्रस्तावना संविधान के अनुच्छेदों की अस्पष्ट भाषा को । नियंत्रित नहीं कर सकती।


प्रस्तावना संविधान का अंग है: (केशवानंद भारती मामला , 1973)


यह दुख के साथ-साथ रिकार्ड रखने का विषय है कि बेरुबारी बाद में जाने माने न्यायाधीशों ने संवैधानिक इतिहास को नजरअंदाज किया। संविधान सभा द्वारा अपनाए गए प्रस्ताव में अनेक शब्दों में कहा गया कि प्रस्तावना संविधान का ही अंग है। यह गलती केशवानंद वाद में सुधारी गई, जिसमें स्पष्ट किया गया कि प्रस्तावना संविधान के अन्य प्रावधानों की तरह ही संविधान का हिस्सा है। इस प्रकार केशवानंद भारती वाद ने इतिहास रचा।


केशवानंद भारती वाद में तेरह न्यायाधीशों की बेंच में से कुछ न्यायाधीशों के क्या विचार थे यह जानना बड़ा रुचिकर है कि पहली बार 13 न्यायाधीशों की पीठ प्रारंभिक क्षेत्राधिकार के अंतर्गत एक रिट याचिका को सुनवाई के लिए बैठी। 13 न्यायाधीशों में से 11 ने अलग राय व्यक्त की। 

केशवानंद भारती वाद में न्यायालय की राय का अनुपात का पता लगाना आसान कार्य नहीं है, लेकिन प्रस्तावना के उद्देश्य से आसानी से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि केशवानंद भारती वाद पर निर्णय इस पक्ष में था कि–

(क) संविधान की प्रस्तावना संविधान का अंग है।

(ख) प्रस्तावना न तो शक्ति का स्रोत है, न सीमित या निषिद्ध का स्रोत है।

(ग) संविधान की ऐसे प्रावधानों की व्याख्या करने में प्रस्तावना का अत्यधिक महत्व हैं, जिनमें प्रावधान की वृहद् और गहरी पहुंच को समझना हो या किसी प्रावधान में अस्पष्टता हो। ऐसे प्रावधानों में अर्थ में प्रस्तावना पर निर्भर रहा जा सकता है। जिन प्रावधानों का अर्थ व भाषा स्पष्ट हैं, उनको व्याख्या के लिए प्रस्तावना पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।


केशवानंद भारती वाद न्यायमूर्ति वाई. वी. चंद्रचूड़ द्वारा एक रुचिकर तर्क दिया गया, उनका कहना था कि प्रस्तावना संविधान का अंग है, लेकिन यह संविधान का प्रावधान नहीं है, इसलिए प्रस्तावना को बदलने के लिए आप संविधान में संशोधन नहीं कर सकते। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने माना कि यह विचार स्वीकार नहीं किया जा सकता कि प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है।

     यह संविधान का हिस्सा है तथा यह अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन की परिधि से बाहर नहीं है। संविधान सभा के अभिलेख इस तरह के विवाद के लिए कोई जगह नहीं छोड़ते। यह संविधान सभा की कार्यवाही से सर्वविदित है कि प्रस्तावना को मतदान के पश्चात् संविधान के अंग के रूप में स्वीकार किया गया था।


प्रस्तावना प्रकाश पुंज की भांति इतिहास का एक उद्दीप्त विचार व अवधारणा है, इसलिए तर्क दिया जाता है कि वर्तमान और भविष्य में कितना भी शक्तिशाली शासक क्यों न हो, वह ऐतिहासिक तथ्यों में संशोधन नहीं कर सकता। 

   यद्यपि इतिहास के तथ्यों में संशोधन नहीं किया जा सकता, परंतु प्रस्तावना में संशोधन किया जा सकता है।


केशवानंद भारती वाद भारत के संवैधानिक इतिहास में एक मील का पत्थर होने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण मोड़ भी था। महत्वपूर्ण संवैधानिक विषय पर न्यायिक निर्णय में इस वाद से आया बदलाव संवैधानिक कानून छात्रों के लिए आश्चर्यजनक व अत्यधिक रुचिकर है। प्रत्येक न्यायाधीश द्वारा अपनी राय उत्कृष्ट व मनपसंद शब्दों में व्यक्त की गई, जिनमें हमारे संविधान निर्माताओं की 'हम भारत के लोग' की भावना व्यक्त होती है।


न्यायमूर्ति डी. जी. पालेकर ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का अंग है, इसलिए यह अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधन योग्य है। उन्होंने कहा कि मौलिक अधिकारों को प्रस्तावना का विस्तार मानना अतिशयोक्ति व आधा सत्य है। 


न्यायमूर्ति एच आर खन्ना की राय में प्रस्तावना सविधान का अंग है। उन्होंने प्राकृतिक अधिकारों की अवधारणा का विकास कर इसे प्रस्तावना में प्रतिस्थापित स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र के मूल्य से संबद्ध किया। उन्होंने कहा कि ये अधिकार अहस्तांतरणीय है, इसीलिए इनमें संशोधन नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन अधिकारों व मूल्यों को मनुष्य ने युगों के संघर्ष से संजोए रखा है।


न्यायमूर्ति खन्ना ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया, जो कहता था कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है। उनके अनुसार, 'प्रस्तावना संविधान से पहले चलती है। उनकी राय में प्रस्तावना भी अन्य प्रावधानों की तरह ही संविधान का अभिन्न हिस्सा है, इसलिए आधारभूत ढांचे को छोड़कर इसमें संविधान के अन्य प्रावधानों की तरह प्रस्तावना में भी संशोधन किया जा सकता है। आधारभूति या मूलभूत ढांचे को संशोधन की शक्ति पर प्रतिबंधक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।


न्यायमूर्ति एस. एन. द्विवेदी ने भी न्यायमूर्ति ए. एन. रे के निष्कर्ष व निर्णय के समान ही अपने विचार रखे, जिसने कहा था कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है। न्यायमूर्ति द्विवेदी ने प्रस्तावना को संविधान का अंग बताने के साथ-साथ इसे संविधान का प्रावधान भी घोषित किया।


निष्कर्ष में न्यायमूर्ति बेग ने कहा कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन की शक्ति पर कोई नियंत्रण नहीं है।


इस प्रकार उद्देशिका को अब संविधान का एक अभिन्न अंग माना जाता है। फिर भी यह भी अपनी जगह सत्य है कि यह न तो किसी शब्द का कोई स्रोत है और न ही उसको किसी प्रकार से सीमित करता है।


बोम्बई मामले (1994) में उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति एस आर रामास्वामी ने कहा उद्देशिका संविधान का अभिन्न अंग है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था, संघात्मक ढांचा, राष्ट्र की एकता और अखंडता, पंथनिरपेक्षता , समाजवाद , सामाजिक न्याय तथा न्यायिक पुनरावलोकन संविधान के बुनियादी तत्वों में है। 


एलआईसी ऑफ इंडिया मामले (1995) में पुनः उच्चतम न्यायालय ने कहा की प्रस्तावना संविधान का आंतरिक हिस्सा है।


निष्कर्ष : 


इस प्रकार तमाम वाद-विवाद के परिणाम स्वरुप निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि प्रस्तावना भारतीय संविधान का अभिन्न अंग है। किन्तु यह न तो किसी शक्ति का स्रोत है और न ही किसी शक्ति को सीमित करता है। 


भारतीय संविधान की अन्य पोस्ट्स : अवश्य पढ़ें 

● संविधान किसे कहते हैं: अर्थ और परिभाषा 

● संविधान कितने प्रकार के होते हैं?

● प्रस्तावना क्या है? व भारतीय संविधान की प्रस्तावना


धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


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13 June 2021

पुरातत्व किसे कहते हैं ? पुरातत्व का सामाजिक विज्ञान के विषयों से संबंध | What is archaeology in hindi | Relation of archaeology with social science.

 पुरातत्व को परिभाषित कीजिये तथा उसका सामाजिक विज्ञान से संबंध बताईये -


"Archaeology is a study of clue in which planning and chances play a vital role in excavation.


"पुरातत्व एक संकेत क्रम का अध्ययन है जिसमें योजनाएँ एवं परिस्थितियाँ उत्खनन में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती है। साधारणतया इसे अध्ययन की वह विधा माना जाता है जो पुराने काल की भूमि में गड़ी सामग्रियों को उजागर कर उनके सहारे हमारे अतीत को मुखरित करता है।"

पुरातत्व क्या है?

पुरातत्व क्या है ?


पुरातत्व का अंग्रेजी भाषा में आर्कियोलॉजी (Archaeology) कहा जाता है। यह दो यूनानी शब्दों (Archaios) तथा (logos) से मिलकर बना है जिसमें archaios (आर्कियोस) का अर्थ होता है 'पुरातन' और logos (लोगोस) का 'ज्ञान'। 

"इस प्रकार पुरातन वस्तुओं के ज्ञान कराने वाले विज्ञान को 'पुरातत्व' कहते हैं।"


पुरातत्व को विद्वानों ने अपने अपने ढंग से परिभाषित किया है–

गार्डन चाइल्ड के अनुसार ,“पुरातत्व भौतिक अवशेषों के माध्यम से मानव के क्रियाकलापों का अध्ययन कहा जा सकता है।"

 ग्राह क्लार्क ने कहा है- "Archaeology my be simply defined as the systematic study of antiquities as a means of reconstructing the past"

बीतते समय के साथ इसकी परिकल्पना एवं विषय क्षेत्र में परिवर्तन तथा परिवर्धन होता गया। पुरातत्व को अब प्रायः 'इतिहास के पुनर्निर्माण के निमित्त पुरावशेषों का वैज्ञानिक अध्ययन' कहकर परिभाषित करते हैं।


 यह मानव संस्कृति एवं इतिहास को कालक्रम तथा सांस्कृतिक विकास के परिप्रेक्ष्य में एक नवीन आयाम प्रदान करता है। लेखनी के विकास के पूर्व का सम्पूर्ण इतिहास जो प्रागैतिहास के अन्तर्गत आता है, उसका एक मात्र आधार पुरातत्व है। 


पुरातत्व के अध्ययन का आधार तत्कालीन मानव द्वारा निर्मित और उपयोग किये गए उपकरण (Artefacts) है।  पुरातत्ववेत्ता इन पुरावशेषों का संकलन और अध्ययन पुरातात्विक सर्वेक्षण एवं उत्खनन के द्वारा करता है।


संबंधित पोस्ट्स 

● पुरातत्व किसे कहते हैं? तथा पुरातत्व का विज्ञान और मानविकी के विषयों से संबंध।

● पुरातत्व की 32 परिभाषाएं।


पुरातत्व के 2 पक्ष : 


पुरातत्व के दो पक्ष हैं- पहला क्रियात्मक तथा दूसरा विवेचनात्मक

क्रियात्मक के अंतर्गत पुरातात्विक सामग्री को संकलित करते है। जैसे- सर्वेक्षण , उत्खनन आदि। 

  विवेचनात्मक पक्ष में पुरातत्ववेत्ता भौतिक साक्ष्यों का विश्लेषण करके इतिहास की रचना करता है।

पुरातत्व का अन्य विषयों से संबंध : 


पुरातत्व एक बहुआयामी विषय है। यह अपने उद्देश्य प्राप्ति , पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर मानव इतिहास की संरचना , के लिए विविध सामाजिक विज्ञानों व प्राकृतिक विज्ञानों की सहायता लेता है। 


पुरातत्व का सामाजिक विज्ञानों से संबंध :


हम जानते हैं कि इस सामाजिक विज्ञान के अंतर्गत इतिहास, नृतत्वशास्त्र, समाजशास्त्र, तथा भूगोल आदि विषय आते हैं जिनकी सहायता से पुरातत्व का अध्ययन सम्भव हो पाता है। 


आईये उनके सह-संबंधों को समझने का प्रयास करते हैं।


1. पुरातत्व का इतिहास से संबंध-


"Archaeology is a compliment of history and hence bears closest relation to it"


इतिहास की अनेक आधारशिलाओं में से पुरातत्व एक प्रमुख स्रोत है। चूंकि लेखनी के पूर्व का समस्त इतिहास का एकमात्र आधार पुरातत्व ही है अतः प्रागैतिहासिक काल और आद्य ऐतिहासिक काल का ज्ञान हमें सिर्फ पुरातत्व से ही मिलता है। 

पुरातत्व का इतिहास दोनों का मूल उद्देश्य मानव के विकास का अध्ययन करना है इसलिए दोनों अत्यंत सन्निकट हैं। दोनों की पद्धति समान तथा कालानुक्रम उनकी आधारशिला है। 

        इतिहासकार बिना पुरातत्व की सहायता से केवल साहित्यिक उल्लेखों से इतिहास लेखन लगभग नहीं कर सकता है। 

इसके अलावा पुराविद भी प्राप्त सामग्रियों की व्याख्या के लिए इतिहास का सहारा लेते हैं। इतिहास के ही सहारे वह तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में ही प्राप्त सामग्रियों की व्याख्या दे सकते हैं इसलिए पुराविद को भी इतिहास का सामान्य ज्ञान होना चाहिए। 

इस प्रकार पुरातत्व और इतिहास घनिष्ठ रूप से संबंधित है।

2. पुरातत्व और नृतत्वशास्त्र का संबंध :


नृतत्व शास्त्र पुरातत्व से घनिष्ठ रूप से संबंधित है। हम जानते हैं कि नृतत्वशास्त्र के अंतर्गत मानव की शारीरिक संरचना, समाज, संस्कृति, भाषा आदि का अध्ययन किया जाता है। तथा पुरातत्वविद भी उपरोक्त का अध्ययन प्राचीन मानवों के संदर्भ में करते हैं। इस प्रकार दोनों का उद्देश्य मानव के विकास का अध्ययन करना है। 


नृतत्वशास्त्र के मूलतः 2 अंग है- शारीरिक नृतत्वशास्त्र तथा सामाजिक नृतत्वशास्त्र। 

शारीरिक नृतत्वशास्त्र मानव के कंकालों के दांतो का अध्ययन कर उनके जीवन शैली व खाद्य पदार्थों पर समुचित प्रकाश डाला जा सकता है। तथा हड्डियों के सूक्ष्म अध्ययन के माध्यम से उनके स्वास्थ्य, जीवन शैली , आयु  आदि के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की जाती है। 

       पुरातत्वविद भी इन्ही के पद चिन्हों पर आदिम मानवों की तथा उनके सांस्कृतिक विकास की दिशा का आकलन करता है।

इस प्रकार हम यह पाते हैं कि पुरातत्व नृतत्वशास्त्र से घनिष्ठतया संबंधित है।

3. पुरातत्व का भूगोल से संबंध : 


 भौगोलिक स्थिति ही मानव को अपनी सभ्यता के विकास के लिये परिवेश प्रदान करती है। अतः भूगोल मानव जीवन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। पुरातत्व शास्त्रियों को किसी भी पुरास्थल के अध्ययन के लिए वहां की अतीत की भौगोलिक परिस्थितियों का भी अध्ययन करना पड़ता है। 


पुराविद को यह जानना पड़ता है कि पुरास्थल का कैसी भौगोलिक स्थिति में उद्भव और विकास हुआ। तथा वहाँ की  तत्कालीनउर्वरता , नदियों की स्थिति , बन्दरगाह , संचार माध्यम आदि का भी ज्ञान रखना पड़ता है। यह भूगोल का विषय है और इसी का अध्ययन पुरातत्वशास्त्री भी करते हैं। अतः पुरातत्व भूगोल से निश्चित रूप से संबंधित है।


4. पुरातत्व तथा समाजशास्त्र :

प्राचीन मानव के समाज को समझने के लिए समाजशास्त्र के सिद्धांतों का ज्ञान भी आवश्यक है। क्योंकि हम जानते हैं कि पुरातत्व तथा प्रागैतिहास में हमारे अध्ययन की इकाई समाज होता है।

समाजशास्त्र में सामाजिक संरचना, उसकी क्रिया-कलापों, समाज की संस्कृतियाँ, उसके विभिन्न रीतियों, संस्कारों, जन-जातियों आदि का अध्ययन होता है। पुराविद् के लिए सामाजिक और राजनीतिक अध्ययन की जानकारी आवश्यक होती है। समाज में स्पष्ट सामाजिक वर्ग कब बने, परिवार, समूह विवाह एवं अन्य संस्कारों का कैसे और कब उदय हुआ। पुरातत्व में इसी का अध्ययन अतीत के परिप्रेक्ष्य में भौतिक अवशेषों के माध्यम से किया जाता है अतः पुराविद् के लिये इसका ज्ञान आवश्यक है।


जहां समाजशास्त्री का क्षेत्र वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समाज का स्वरूप जानना होता है वहीं पुरातत्त्वविद् का कार्य इसकी आदिम स्थिति की लुप्त कड़ियों की खोज होता है। आज पुरातात्त्विक उत्खननों से पुरातन की अनेक अज्ञात कड़ियों को खोजकर समाजशास्त्रियों के लिये समाज के विकास का मार्ग प्रशस्त पुरातात्त्विकों ने किया है।


निष्कर्ष :


इस प्रकार हम देखते हैं कि पुरातत्ववेत्ता उत्खनन से प्राप्त समग्रियों की व्याख्या के लिए ज्ञान की कई शाखाओं से सहायता लेता है और उनके सहयोग से ही इसके विषय में अपने अध्ययन को आगे बढ़ाता है। इनकी भागीदारी से ही वह क्रम निर्धारण, तिथिकरण और समुचित विवेचना में प्रगतिशील होता है। अतः पुरातत्व सामाजिक विज्ञान के विषयों से घनिष्ठ रूप से संबंधित है।

धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


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11 June 2021

प्रस्तावना (Preamble) | भारतीय संविधान की प्रस्तावना | Preamble of indian constitution

 प्रस्तावना क्या है ? What is Preamble


प्रत्येक संविधान के प्रारम्भ में सामान्यतया एक प्रस्तावना या उद्देशिका (Preamble) होती है जिसके द्वारा संविधान में मूल उद्देश्यों व लक्ष्यों व दर्शन को स्पष्ट किया जाता है।

 इस प्रस्तावना का मुख्य प्रयोजन संविधान निर्माताओं के विचारों तथा उद्देश्यों को स्पष्ट करना होता है जिससे संविधान की क्रियान्विति तथा उसके पालन में संविधान की मूल भावना का ध्यान रखा जा सके। 

Note : प्रस्तावना को सर्वप्रथम अमेरिकी संविधान में शामिल किया गया था, इसके बाद भारत समेत कई देशों ने इसे अपनाया। 


भारतीय संविधान की प्रस्तावना : 

भारतीय संविधान की प्रस्तावना


भारतीय संविधान के उद्देश्य और उसके आधारभूत दर्शन का प्रतिबिंब संविधान की प्रस्तावना में देखा जा सकता है–

उद्देशिका / प्रस्तावना (Preamble) : 


“हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्त्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिये तथा इसके समस्त नागरिकों को

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, 

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, 

प्रतिष्ठा और अवसर की समता 

प्राप्त कराने के लिये तथा उन सब में

व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता 

तथा अखंडता सुनिश्चित करने वाली 

बंधुता बढ़ाने के लिये 

दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी , संवत दो हजार छः विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”


Note : 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम , 1976 के द्वारा भारतीय संविधान की प्रस्तावना में - 'समाजवादी' तथा 'पंथनिरपेक्ष' शब्द जोड़े गए तथा इसके अलावा 'राष्ट्र की एकता' शब्दों के स्थान पर 'राष्ट्र की एकता और अखण्डता' शब्द कर दिये गए।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना से निम्न बातें स्पष्ट होती हैं–


1. संविधान का स्रोत : 


भारतीय संविधान का स्रोत भारत के लोग अर्थात जनता है।  क्योंकि संविधान का निर्माण भारत की जनता की ओर से निर्वाचित संविधान सभा के सदस्यों ने किया और उन्हीं के द्वारा इसे अंगीकृत किया गया।  


2. राज्य का स्वरूप : 


भारतीय संविधान की प्रस्तावना यह स्पष्ट करती है कि भारत एक पूर्ण संप्रभु , समाजवादी , पंथनिरपेक्ष , लोकतांत्रिक , गणराज्य है। 


3. भारतीय संविधान के उद्देश्य की स्पष्टीयता : 

प्रस्तावना के अनुसार भारतीय संविधान के निम्न उद्देश्य हैं–

i. नागरिकों को सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुलभ कराना।

ii. विचार , अभिव्यक्ति , विश्वास , धर्म और उपासना की स्वतंत्रता उपलब्ध कराना।

iii. प्रतिष्ठा और अवसर की समता को सुनिश्चित करना।

iv. व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ाना। 


(अर्थात) इसमें उन महान अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं की घोषणा की गई है जिन्हें भारत के लोगों ने सभी नागरिकों के लिए सुनिश्चित बनाने की इच्छा की थी।


संबंधित लेख : अवश्य देखें

● संविधान किसे कहते हैं: अर्थ और परिभाषा 

● संविधान कितने प्रकार के होते हैं?


4. संविधान के प्रवर्तन की तिथि : 

प्रस्तावना भारतीय संविधान के लागू होने की तिथि बताती है- 26 नवंबर 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत दो हजार छः विक्रमी)।


विशेष : उद्देशिका में भारतीय राजव्यवस्था एवं सरकार के स्वरूप के साथ साथ नागरिकों के अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं का भी वर्णन किया गया है। 


प्रस्तावना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : 


➢ भारतीय संविधान की प्रस्तावना का सीधा सम्बंध उस उद्देश्य प्रस्ताव से है जिसे पं० नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 ने संविधान सभा मे पेश किया। इसे संविधान सभा ने 22 जनवरी 1947 को पारित किया था। बाद में इसी उद्देश्य प्रस्ताव से संविधान की प्रस्तावना (Preamble) बनी। 

➢ पंडित नेहरू का यह उद्देश्य प्रस्ताव राष्ट्रीय आंदोलन के लक्ष्यों तथा महात्मा गांधी के विचारों और भावनाओं पर आधारित था।

➢ संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार बी.एन. राव ने नेहरू के उद्देश्य प्रस्ताव के आधार पर प्रस्तावना का प्रारूप तैयार किया। 

➢ संविधान की प्रारूप समिति ने इस प्रारूप पर विचार किया तथा इसमें आवश्यक संशोधन करके संविधान के कार्यों के आखिरी चरण में इसे पारित किया ताकि यह संविधान के विभिन्न प्रावधानों के अनुरूप हो।

➢ आपात स्थिति के दौरान 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा प्रस्तावना में 'समाजवादी' , 'पंथनिरपेक्ष' , 'और अखण्डता' शब्दों को जोड़ दिया गया। 

प्रस्तावना का महत्व : 


सभी संविधानों में प्रस्तावना का अपना महत्व होता है। ठीक उसी प्रकार भारतीय संविधान के प्रारंभ में वर्णित प्रस्तावना का संविधान निर्माण में तथा अन्य कई महत्व हैं। ये निम्नवत् हैं–


1. उद्देशिका में उस आधारभूत दर्शन तथा राजनीतिक धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों का उल्लेख है जो हमारे संविधान के आधार स्तंभ है।

2. उद्देशिका में जनता की भावनाएं तथा आकांक्षाएं सूक्ष्म रूप से समाविष्ट हैं।

3. प्रस्तावना जटिल संवैधानिक परिस्थितियों में प्रकाश स्तंभ के रूप में कार्य करती है एवं शासन को भी उसके दायित्वों का बोध कराती है। 

4. उद्देशिका में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र को समानता और बंधुता से जोड़ते हुए स्थापित करने का प्रयत्न किया गया।

5. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में बीसवीं शताब्दी के समग्र राजनीतिक और सामाजिक दर्शन का सार देखा जा सकता है। 

6. प्रस्तावना न्यायालय के लिए भी पथ प्रदर्शक का कार्य करती है जहां कानून जटिल एवं अस्पष्ट होते हैं वहां न्यायाधीश प्रस्तावना की ओर आशाभरी निगाहों से देखते हैं।

प्रस्तावना / उद्देशिका को किसने क्या कहा ? 


➥ संविधानविदों ने उद्देशिका को संविधान की आत्मा के समान माना है। 

➥ संविधान सभा के सदस्य सर अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर के अनुसार संविधान की प्रस्तावना हमारे दीर्घकालिक सपनों का विचार है।

महात्मा गांधी ने संविधान की प्रस्तावना को 'मेरे सपनों का भारत' कहकर संबोधित किया था।

➥ भारतीय संविधान के उद्देश्य में में किए गए सफल संयोजन की अर्नेस्ट बार्कर (लोकतांत्रिक शासन के विषय में आधुनिक चिंतन) ने भूरि भूरि प्रशंसा की है। 

उन्होंने अपनी पुस्तक 'principal of Social and political theory' के प्रारंभ में इस प्रस्तावना को ज्यों का त्यों उद्धृत किया है। तथा उन्होंने लिखा कि "भारतीय संविधान की प्रस्तावना में इस पुस्तक के समस्त तर्क संक्षेप में समाहित हैं और वह इस पुस्तक की कुंजी के रूप में कार्य कर सकती है।"

सुभाष कश्यप ने प्रस्तावना को संविधान की आत्मा कहा है। 

सुब्बा राव के शब्दों में ,"प्रस्तावना संविधान की आकांक्षाओं तथा आदर्शों को स्पष्ट करती है।"

बेरुबाड़ी के मामले में , उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर सहमति प्रकट की थी कि "उद्देशिका संविधान निर्माताओं के मन की कुंजी है।"

➥ गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के मामले में न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह ने विचार व्यक्त किया कि संविधान की उद्देशिका उन सिद्धांतों का निचोड़ है जिनके आधार पर सरकार को कार्य करना है।

 वह “संविधान की मूल आत्मा है, शाश्वत है, अपरिवर्तनीय है।"

➥ भारतीयचंद्र भवन बनाम मैसूर राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भाग 4 में वर्णित निर्देशक तत्वों तथा भाग 3 में वर्णित मूल अधिकारों को भी उद्देशिका में अच्छी तरह समझा जा सकता है। 

➥ माननीय उच्चतम न्यायालय के शब्दों में, "हमारे संविधान का प्रसार उद्देशिका में वर्णित बुनियादी तत्वों पर खड़ा है यदि इनमें से किसी भी तत्व को हटा दिया जाए तो सारा ढांचा ही रह जाएगा और संविधान वहीं रह जाएगा। अर्थात अपना व्यक्तित्व और पहचान खो देगा।"

डॉ० लक्ष्मीमल सिंघवी ने कहा है कि , "हमारे संविधान की आत्मा(प्रस्तावना) में मनुष्य की सभ्यता के आधुनिक विकास क्रम का हृदयस्पंदन है। उसकी अंतरात्मा न्याय , समता , अधिकार एवं बंधुत्व के भाव से अभिसिंचित है।"

➥ "प्रस्तावना संविधान को समझने की कुंजी है।"


इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना के बारे में अनेक विद्वानों ने अपने भिन्न-भिन्न मत व्यक्त किए हैं। 


प्रस्तावना में उल्लिखित शब्दों के अर्थ :


★ हम भारत के लोग-

उद्देशिका या प्रस्तावना का आरंभ हम भारत के लोग शब्द से होता है इसका तात्पर्य यह है कि- संविधान का मूल स्रोत भारत की जनता है , वही समस्त शक्तियों का केंद्र बिंदु है । 

संविधान द्वारा प्रदत्त संप्रभुता जनता में निहित है तथा भारतीय संविधान इसकी इच्छा का परिणाम है। 

यह शब्द संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर की उद्देशिका में प्रयुक्त शब्द 'हम संयुक्त राष्ट्र के लोग' के समान है।


इस प्रकार इस से दो बातें स्पष्ट होती है- प्रथम संविधान के द्वारा अंतिम प्रभुसत्ता भारतीय जनता में निहित है। द्वितीय संविधान निर्माता भारतीय जनता के प्रतिनिधि हैं। 

★ सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न-

 उद्देशिका के अनुसार भारत एक "सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न" राष्ट्र होगा इसका अर्थ है कि भारत अपनी आन्तरिक एवं बाह्य मामलों में किसी विदेशी सत्ता या शक्ति के अधीन नहीं है। वह अपनी आन्तरिक एवं विदेश नीति निर्धारित करने के लिए तथा किसी भी राष्ट्र के साथ मित्रता एवं संधि करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है। 

यद्यपि वर्ष 1949 में भारत ने राष्ट्रमण्डल की सदस्यता स्वीकार करते हुए ब्रिटेन को राष्ट्रमण्डल का प्रमुख माना। साथ ही भारत ने अपने संविधान में स्पष्ट कर दिया है कि भारत पूर्ण प्रभुता संपन्न होगा और अपने राष्ट्राध्यक्ष का स्वयं निर्वाचन करेगा।  राष्ट्रमंडल की सदस्यता उसे किसी प्रकार से उसकी संप्रभुता को किया प्रभावित नहीं करेगी । वह ब्रिटिश सम्राट को केवल राष्ट्रमंडल का अध्यक्ष मानेगा अपना राज्याध्यक्ष नहीं।


★ समाजवादी-

42वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा उद्देशिका में समाजवादी" शब्द जोड़ा गया। भारत का समाजवाद लोकतांत्रिक समाजवाद है जो नेहरू की अवधारणा पर आधारित है।

 समाजवादी व्यवस्था में उत्पादन के प्रमुख साधनों पर सरकारी नियंत्रण होता है और यह नियंत्रण कम या ज्यादा हो सकता है। जबकि साम्यवादी समाजवाद में राज्य का नियंत्रण अधिक कठोर होता है। लोकतांत्रिक समाजवाद में नियंत्रण अपेक्षाकृत कम होता है। हमारा समाजवाद आर्थिक समानता, आय के समान वितरण, वंचित वर्गों के जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा उन्हें अधिकाधिक सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने पर बल देता है।

        अर्थात् भारत ने बीच का रास्ता अपना कर मिश्रित व्यवस्था को जन्म दिया है।

 संविधान के विभिन्न उपबंधों जैसे– आर्थिक न्याय भाग-4 विशेषतः अनुच्छेद 39, 39 (ख) तथा 39 (ग) के तहत समाजवादी दृष्टिकोण प्रदर्शित होता है। इन अनुच्छेदों में यह प्रतिध्वनित होता है कि देश के भौतिक साधनों का यथासंभव समानता के आधार वितरण होगा तथा धन का संकेन्द्रण कुछ ही हाथों तक सीमित नहीं रहेगा। 

Note: भारतीय समाजवाद मार्क्सवाद और गांधीवाद का मिला-जुला रूप है जिसमें गांधीवादी समाजवाद की ओर ज्यादा झुकाव है।


★ पंथनिरपेक्ष- 

इसे भी 42 वें संविधान संशोधन के द्वारा जोड़ा गया। यह संविधान भारत में एक धर्मनिरपेक्ष राज व्यवस्था स्थापित करने का प्रबंध करता है। जबकि हमारे पड़ोसी देश अफगानिस्तान, भूटान, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका ने धार्मिक राज को स्वीकार किया है।

       इसे धर्म के विरोधाभास के रूप में नहीं देखा जा सकता, भारत में राज्य का कोई धर्म नहीं है। धर्मनिरपेक्ष राज्य का आशय है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होता। राज्य अपने कार्य के लिए धर्म को आधार नहीं मानता तथा धर्म के नाम पर राज्य नागरिकों के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करता। राज्य धर्म को व्यक्ति विश्वास की वस्तु समझता है तथा के धर्म और राजनीति की पृथकता में विश्वास करता है।

हमारा धर्मनिरपेक्ष स्वरूप सकारात्मक है। इसमें अल्पसंख्यकों की संस्कृति और शैक्षणिक अधिकारों की न केवल रक्षा की गई है अपितु पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए विशेष व्यवस्था भी की गई है।


★ लोकतांत्रिक-

लोकतंत्र से तात्पर्य है 'लोगों का तंत्र' अर्थात 'जनता का शासन'। लोकतंत्र में जनता अपने द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन चलाती है। दूसरे शब्दों में शासन चलाने का अधिकार सिर्फ उन्हीं को है जो जनता द्वारा निर्वाचित हैं। इसे आम प्रतिनिधि प्रणाली कहा जाता है। शक्ति का स्रोत आम जनता है इसलिए लोकतंत्र में जनता को जनार्दन माना जाता है। 

★ गणराज्य- 

यह संविधान में एक गणराज्य स्थापित करने की व्यवस्था करता है। अर्थात भारत का राष्ट्राध्यक्ष निर्वाचित होगा न कि वंशानुगत। वंशानुगत व्यवस्था में राज्य का प्रमुख (राजा या रानी) उत्तराधिकारिता के माध्यम से पड़ पर आसीन होता है जैसा कि ब्रिटेन में है। वहीं गणतंत्र/गणराज्य व्यवस्था में राज्य प्रमुख हमेशा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से एक निश्चित समय के लिए चुन कर आता है जैसे अमेरिका व भारत आदि देशों में है। 

गणराज्य के सभी नागरिक समान होते हैं वह किसी भी लोकपद हेतु निर्वाचित हो सकते हैं। 


★ सामाजिक , आर्थिक , राजनीतिक न्याय-


न्याय तीनों रूपों में शामिल है–

1. सामाजिक न्याय- सामाजिक न्याय का तात्पर्य यह है कि किसी भी व्यक्ति के साथ जाति , वर्ण , लिंग , धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा तथा सभी के साथ इन उपरोक्त से उठकर समान व्यवहार किया जाएगा। साथ ही प्रत्येक नागरिक को उन्नति के समुचित अवसर सुलभ हो।


2. आर्थिक न्याय- आर्थिक न्याय का अर्थ है कि उत्पादन एवं वितरण के साधनों का न्यायोचित वितरण हो और धन संपदा का केवल कुछ ही हाथों में केंद्रीकृत ना हो जाए। 

अतः आर्थिक कारणों के आधार पर किसी भी व्यक्ति से भेदभाव नहीं किया जाएगा इसमें संपदा, आय व संपत्ति की असमानता को दूर करना भी शामिल है।


3. राजनीतिक न्याय- राजनीतिक न्याय से तात्पर्य है कि भारत में निवास करने वाले सभी व्यक्ति को समान रूप से नागरिक व राजनीतिक अधिकार प्राप्त हो। 

★ स्वतंत्रता-

भारतीय संविधान के अंतर्गत न केवल न्याय , वरन इसके साथ ही स्वतंत्रता को भी संविधान का लक्ष्य घोषित किया गया है। हमारे संविधान निर्माता नकारात्मक स्वतंत्रता की धारणा से नहीं वरन ऐसी सकारात्मक स्वतंत्रता से प्रेरित थे जिनके आधार पर व्यक्तियों के व्यक्तित्व का विकास संभव होता है। 

 इसी आधार पर उनके द्वारा विचार अभिव्यक्ति विश्वास धर्म और उपासना की स्वतंत्रता को संविधान में स्थान दिया गया है। स्वतंत्र न्यायपालिका की धारणा को अपनाते हुए संविधान के अंतर्गत स्वतंत्रता की रक्षा के साधन की भी व्यवस्था की गई है।


★ समानता- 

समानता स्वतंत्रता की पूरक है और हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा समानता को दो आयामों में अपनाया गया है; यह है 'प्रतिष्ठा की समानता' और 'अवसर की समानता'। अवसर की समानता वह साधन है जिसके आधार पर प्रतिष्ठा की समता को प्राप्त किया जा सकता है।

समानता समाज के किसी भी वर्ग के लिए विशेषाधिकार की अनुपस्थिति और बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति को समान अवसर प्रदान करने के उपबंध हैं।

★ बंधुत्व-

बंधुत्व का अर्थ है 'भाईचारे की भावना'।

प्रस्तावना द्वारा अपने सभी नागरिकों में ऐसी बन्धुता (fraternity) बढ़ाने का संकल्प लिया गया है जो व्यक्ति के गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखण्डता' को सुनिश्चित करने वाली है, अखण्डता शब्द को 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया है। 

साथ ही उद्देशिका के अन्तिम भाग में संविधान को अंगीकृत करने तथा अधिनियमित करने की तिथि का वर्णन किया गया है जिसके अनुसार संविधान सभा ने संविधान को 26 नवम्बर, 1949 को अंगीकृत तथा अधिनियमित करके राष्ट्र को समर्पित किया था। हमारे संविधान निर्माता एक ऐसे कल्याणकारी राज्य (Welfare state) की स्थापना करना चाहते थे जो "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" पर आधारित हो।


निष्कर्ष:- 


इस प्रकार संविधान की प्रस्तावना बेहद महत्वपूर्ण एवं उपयोगी है। इसमें शासन के उद्देश्यों का उल्लेख है। इसका उपयोग संविधान के अस्पष्ट उपबन्धों के निर्वाचन में किया जा सकता है। किन्तु यह संविधान के स्पष्ट प्रावधानों को रद्द (override) नहीं करता है और न्यायालय द्वारा इसे चुनौती नहीं दिया जा सकता। परंतु इसका संशोधन किया जा सकता है किन्तु उस भाग का नहीं जो संविधान का आधारभूत ढाँचा (Basic Structure) है।

धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र: राजनीति विज्ञान विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


अगले लेख में हम एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु पर चर्चा करेंगे कि क्या प्रस्तावना भारतीय संविधान का अंग है अथवा नहीं? साथ ही बात करेंगे उन सभी विचारों पर जो इस प्रश्न को समझने के लिए उत्तरदायी हों।


प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है अथवा नहीं? (यहां जाएं ☟)


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08 June 2021

इस्लाम धर्म के सिद्धांत | Islam dharm ke siddhant | इस्लाम के 5 स्तंभ | 5 pillers of islam

 

पिछली पोस्ट में हमने जाना कि : इस्लाम क्या है ? 

यहां हम इस्लाम के सिद्धांतों के बारे में आसानी से समझने का प्रयास करेंगे। आप पूरे लेख को ध्यानपूर्वक पढ़ें। तथा इस लेख को पढ़ने के बाद या पहले आप पिछली पोस्ट अवश्य पढ़ लें। 


हम जानते हैं कि इस्लाम एक एकेश्वरवादी धर्म है। इसमें एक ईश्वर के रूप में अल्लाह को माना गया है। इस्लामी परंपरा में ऐसा माना जाता है कि अल्लाह संसार मे सर्वशक्तिमान व सबसे सभी क्षेत्रों में अत्यधिक श्रेष्ठ है। 

गौरतलब है कि इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैगम्बर मुहम्मद साहब थे। उनका जन्म 570 ई० के लगभग अरब प्रायद्वीप में मक्का नगर में हुआ था। परंपरा के अनुसार अल्लाह समय समय पर अपने पैगम्बर भेजता रहता है इनमें मुहम्मद साहब अंतिम पैगम्बर थे। 


इस्लाम धर्म : 


इस्लाम धर्म के 5 सिद्धांत


हम जानते हैं कि पैगम्बर मुहम्मद साहब द्वारा दिये गए उपदेशों तथा उनकी शिक्षाओं के सम्मिलित रूप को ही इस्लाम की संज्ञा प्रदान की गयी है। यह वर्तमान समय में व्यापक रूप धारण कर चुका है। इस्लाम मत कट्टरवाद और एकेश्वरवाद में विश्वास करता है। 

एकेश्वरवाद क्या है ?

इस्लामी मान्यता के अनुसार सृष्टि का एकमात्र देवता 'अल्लाह' है । यह सर्वशक्तिमान , सबसे सुंदर , सबसे व्यापक , सर्वज्ञ एवं असीम करुणावान है। उसके अतिरिक्त संसार मे कोई दूसरी शक्ति नहीं है। सभी अल्लाह की संतान हैं लिहाज़ा सभी व्यक्ति जो इस्लाम स्वीकार कर चुके हैं आपस में सगे भाई-बहन हैं। 


पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के बाद बीतते समय के साथ साथ  खिलाफत में उठापटक के साथ साथ इस्लाम 2 पंथों (शिया व सुन्नी) में विभाजित हो गया। इन दोनों शाखाओं में हमेशा से मतभेद और टकराव की स्थिति रही है। सुन्नी पंथ के बहुसंख्यक मुसलमान शियाओं को पूर्ण मुसलमान नहीं मानते हैं। फलस्वरूप ऊपरी सिद्धांतों में भी दोनों पंथ एकमत नहीं हैं। 


सिद्धान्तों में अंतर के बावजूद दोनों पंथ के मूलभूत सिद्धान्त समान हैं जिनका उपदेश/शिक्षा मुहम्मद साहब ने दिया था। 


इस्लाम धर्म के 5 सिद्धांत : 

इस्लामी मान्यताओं और विश्वासों के अनुसार इस्लाम के 5 मूल स्तंभ हैं। जिन्हें मुसलमानों के 5 फ़र्ज़ कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये 5 वो परम आवश्यक कर्म हैं जो हर मुसलमान को अपने जीवनकाल में निष्ठापूर्वक अवश्य पूर्ण करने चाहिए। 

इन सिद्धांतों का वर्णन इस्लाम के प्रसिद्ध हदीस 'हदीस-ए-जिब्रील' में है। 

ये निम्नलिखित हैं–


1. नमाज़

2. रोज़ा 

3. कलमा

4. ज़कात

5. हज़


इस्लाम के 5 स्तंभ :

आईये विस्तारपूर्वक जानते हैं–


1. नमाज़ :


 इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक मुसलमान को प्रतिदिन 5 बार नमाज़ अदा करनी चाहिए। तथा शुक्रवार (जिसे जुमा कहा जाता है) को दोपहर के बाद सभी मुसलमानों को सामूहिक रूप से मस्जिद में इकट्ठे होकर नमाज पढ़ना चाहिए।  


5 बार की नमाजों का समय - 


प्रत्येक मुसलमान के लिए प्रति दिन पाँच समय की नमाज पढ़ने का विधान है।


i. नमाज़ -ए-फ़ज्र (उषाकाल की नमाज)-यह पहली नमाज है जो प्रात: काल सूर्य के उदय होने के पहले पढ़ी जाती है।


ii. नमाज-ए-ज़ुहर (अवनतिकाल की नमाज)- यह दूसरी नमाज है जो मध्याह्न सूर्य के ढलना शुरु करने के बाद पढ़ी जाती है।


iii. नमाज -ए-अस्र (दिवसावसान की नमाज)- यह तीसरी नमाज है जो सूर्य के अस्त होने के कुछ पहले होती है।


iv. नमाज-ए-मग़रिब (सायंकाल की नमाज)- चौथी नमाज जो सूर्यास्त के तुरंत बाद होती है।


v. नमाज-ए-ईशा (रात्रि की नमाज)- अंतिम पाँचवीं नमाज जो सूर्यास्त के डेढ़ घंटे बाद पढ़ी जाती है।


Note : इस्लाम धर्म में यह सबसे बड़ा फ़र्ज़ (कर्तव्य) है। अगर कोई मुसलमान इसको नहीं करता तो यह सबसे बड़ा पाप है । वहीं अगर कोई मुसलमान इस फ़र्ज़ को शिद्दत से निभाता है तो यह उसके लिए सबसे पुण्य का कार्य है। 

2. रोज़ा : 


इस्लामी मत के सिद्धांतों में रोज़ा रखना एक महत्वपूर्ण फ़र्ज़ है। 

इस के अनुसार इस्लामी कैलेंडर के नवें महीने में (जिसे रमज़ान कहा जाता है) सभी सक्षम मुसलमानों के लिये सूर्योदय  से सूर्यास्त  तक व्रत रखना (भूखा प्यासा रहना)अनिवार्य है। इसी व्रत को रोज़ा कहते हैं। रोज़े में हर प्रकार का खाना-पीना वर्जित (मना) है। अन्य व्यर्थ कर्मों से भी अपने आप को दूर रखा जाता है। यौन गतिविधियाँ भी वर्जित हैं। विवशता में रोज़ा रखना आवश्यक नहीं होता। रोज़ा रखने के कई उद्देश्य हैं जिन में से दो प्रमुख उद्देश्य यह हैं कि दुनिया के बाकी आकर्षणों से ध्यान हटा कर ईश्वर से निकटता अनुभव की जाए और दूसरा यह कि निर्धनों, भिखारियों और भूखों की समस्याओं और परेशानियों का ज्ञान हो।


रमजान मास को अरबी में माह-ए-सियाम भी कहते हैं रमजान का महीना कभी २९ दिन का तो कभी ३० दिन का होता है। इस महीने में सभी मुसलमानों को पूरे महीने सुबह से शाम तक का उपवास रखना चाहिए।


Note : सहरी : उपवास के दिन सूर्योदय से पहले कुछ खालेते हैं जिसे सहरी कहते हैं।

इफ़्तारी : दिन भर न कुछ खाते हैं न पीते हैं। शाम को सूर्यास्त होने के बाद रोज़ा खोल कर खाते हैं जिसे इफ़्तारी कहते हैं।


3. कलमा : 


इस्लाम का तीसरा सिध्दांत या फ़र्ज़ कलमा के नाम से जाना जाता है। इसके अनुसार प्रत्येक मुसलमान को अल्लाह पर पूर्ण निष्ठा और विश्वास रखना चाहिए। कलमा इस्लाम का मूल मंत्र है। 

"ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुन रसूलुल्लाह।"

अर्थात : परमेश्वर के सिवा कोई भी परमेश्वर नहीं है, मुहम्मद उस ईश्वर के प्रेषित हैं। 

4. ज़कात : 


जकात इस्लाम के 5 स्तंभों में से एक प्रमुख है। इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक मुसलमान को अपनी आय का 1/40 वां भाग (2.5 %) गरीबों में दान करना चाहिए और उनके कल्याण की कामना करना चाहिए। 


यह एक वार्षिक दान है। जो कि हर आर्थिक रूप से सक्षम मुसलमान को निर्धन मुसलमानों को देना आवश्यक है। यह एक धार्मिक कर्तव्य इस लिये है क्योंकि इस्लाम के अनुसार मनुष्य की पूंजी वास्तव में ईश्वर की देन है। और दान देने से जान और माल कि सुरक्षा होती हे।


5. हज़ : 


हज़ इस्लाम के 5 सिद्धांतों में एक बेहद महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह हर शरीरिक और आर्थिक रूप से सक्षम मुसलमानों को अपने जीवनकाल में एक बार अवश्य करना चाहिए। 

हज उस धार्मिक तीर्थ यात्रा का नाम है जो इस्लामी कैलेण्डर के 12वें महीने में मक्का में जाकर की जाती है। हर समर्पित मुसलमान (जो हज का खर्च‍‍ उठा सकता हो और विवश न हो) के लिये जीवन में एक बार इसे करना अनिवार्य है। 

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निष्कर्ष :


इस प्रकार ये उपरोक्त 5 सिद्धान्तों का प्रतिपादन इस्लामी पवित्र ग्रंथों में किया गया है। इसे मुसलमानों के 5 फ़र्ज़ भी कहते हैं।


हज़रत मुहम्मद ने भ्रातृत्व के सिद्धान्त का प्रचार किया। वे सभी मनुष्यों को बिना किसी भेदभाव के एक समान समझते थे। उन्होंने नैतिकता एवं मानव जाति की सेवा पर बल दिया और मूर्ति पूजा का जोरदार शब्दों में खण्डन किया। वे कर्म सिद्धान्त को भी मानते थे। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि मनुष्य के कर्मों के अनुसार ही उसके भविष्य का जीवन निर्धारित होता है और उसे 'जन्नत' (स्वर्ग) अथवा 'दोज़ख' (नर्क) की प्राप्ति होती है। 

इस्लाम केवल एक अल्लाह में विश्वास रखता है। इस प्रकार एकेश्वरवाद इस्लाम का मूल मन्त्र है। इस्लाम के मानने वालों को अल्लाह के रसूल या पैगम्बर में ही अटूट विश्वास रखना चाहिए। मुसलमानों का पवित्र ग्रन्थ या पुस्तक कुरान है। मुसलमानों को इस पुस्तक की शिक्षाओं का अनुसरण करना चाहिए।


Note : यह article (लेख) विद्यार्थियों के लिए है इसका किसी भी धर्म विशेष की पारंपरिक मान्यताओं से कोई संबंध नहीं है।  


धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

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04 June 2021

इस्लाम क्या है ? Islam kya hai | What is islam in hindi | इस्लाम धर्म का इतिहास

 आज के समय मे विश्व मे व्याप्त अनेकों धर्मों में इस्लाम का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। हम सभी जानते हैं कि इस्लाम धर्म का उदय मध्यकाल में (7वीं शताब्दी ई० में) अरब प्रायद्वीप के मक्का से हुआ था तथा इसके प्रवर्तक मुहम्मद साहब थे। यह धर्म अल्लाह के द्वारा अंतिम पैगम्बर मुहम्मद साहब द्वारा भेजी गई पवित्र पुस्तक 'कुरान' पर पूर्णतः आधारित है। इसमें हदीस, सीरत उन-नबी व शरीयत ग्रन्थ शामिल हैं।


संबंधित लेख : अवश्य पढ़ें 

● इस्लाम धर्म का इतिहास (विस्तृत जानकारी)

● इस्लाम के 5 सिद्धांत (विस्तारपूर्वक) 

इस्लाम : एक एकेश्वरवादी धर्म 


अन्य धर्मों (हिन्दू , ईसाई , यहूदी , सिख  आदि) की भांति इस्लाम भी एक धर्म है। मूलतः यह एक एकेश्वरवादी धर्म है। एकेश्वरवाद का तात्पर्य यह है कि इसमें सिर्फ एक ही (ईश्वर/God) की उपासना की जाती है। एकेश्वरवाद को अरबी में तौहीद कहते हैं, जो शब्द वाहिद से आता है जिसका अर्थ है 'एक'। इस्लाम के अनुसार 'अल्लाह एक है और हम सभी उसके बन्दे हैं।' 

इस प्रकार इस्लाम एक एकेश्वरवादी धर्म है। इस्लाम को मानने वाले मुसलमान कहलाये।

एकेश्वरवाद क्या है ? 


एकेश्वरवाद अथवा एकदेववाद एक ऐसा सिद्धान्त है जो 'ईश्वर एक है' अथवा 'एक ईश्वर है' विचार को सर्वप्रमुख रूप में मान्यता देता है। दूसरे शब्दों में एकेश्वरवाद वह सिद्धांत है जो जिसके अनुसार 'ईश्वर एक है' माना जाता है। 

एकेश्वरवादी एक ही ईश्वर (God) को मानता है , उसी में पूर्ण विश्वास करता है तथा केवल उसी की पूजा-उपासना करता है। 

इसके साथ ही वह किसी भी ऐसी अन्य अलौकिक शक्ति या देवता को नहीं मानता जो उस ईश्वर का समकक्ष हो सके अथवा उसका स्थान ले सके। इसी दृष्टि से बहुदेववाद, एकदेववाद का विलोम सिद्धान्त कहा जाता है।


अल्लाह की प्रमुखता :


इस्लाम में सिर्फ एक ही ईश्वर को प्रमुखता दी गयी है जिन्हें 'अल्लाह' कहा गया है। ऐसा माना जाता है कि अल्लाह अद्वितीय है जिनकी न कल्पना की जा सकती है , न ही समझा जा सकता है , न ही उनके प्रतिबिंब की कल्पना की जा सकती है इसीलिए इस्लाम धर्म में मूर्तियों का कोई स्थान नहीं है और न ही अल्लाह की कोई मूर्ति या चित्र मिलते हैं। 

 इस प्रकार अल्लाह मनुष्यों की समझ से परे है , वह एक अद्भुत और विलक्षण है , उसके समान कोई दूसरा न हुआ है न अब है और न ही कभी हो सकता है। 

इसीलिए मुसलमानों को अल्लाह के बारे में सोचने के बजाय उनकी उपासना , प्रार्थना और जय-जयकार करने के लिए कहा गया है। 


इस्लाम धर्म के संस्थापक : (Founder of Islam)


इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैगंबर मोहम्मद साहब थे। मुहम्मद साहब का जन्म 570 ईसवी में अरब प्रायद्वीप के मक्का नामक नगर में हुआ था। उनके पिता का नाम अब्दुल्ला तथा माता का नाम अमीना था। वह कुरैशी कबीला से संबंधित थे। 

बचपन में ही उनके माता पिता की मृत्यु हो गई जिससे उनका पालन पोषण उनके चाचा अबू तालिब ने किया । अनाथ होने के कारण उनका प्रारंभिक जीवन सुख सुविधाओं से वंचित रहा अर्थात प्रारंभिक जीवन का कष्ट दुखों से भरा रहा तथा निर्धनता में बीता। 


अभी प्रारंभ में बकरियां ऊंट चराया करते थे किंतु समय के साथ धीरे-धीरे अपने चाचा के साथ व्यापार करना भी प्रारंभ कर दिए थे। व्यापार में ही उनका संपर्क खदीजा नामक महिला से हुआ जो एक विधवा थी किंतु आर्थिक रूप से बेहद संपन्न और धनवान थी। मोहम्मद साहब ने उससे विवाह कर लिया तथा एक समृद्ध सौदागर बन गए और लौकिक सुख सुविधाओं की सारी वस्तुएं उन्हें सुलभ हो गयी। 


किंतु वे लौकिक सुख सुविधाओं की अपेक्षा धार्मिक चिंतन की ओर प्रवृत्त हुए । मक्का के समीप हीरा की पहाड़ी में गुफा में बैठकर भी ध्यान लगाते थे । ध्यान करते हुए मोहम्मद को एक बार जिब्राइल के माध्यम से अल्लाह का पैगाम मिला कि वह सत्य का प्रचार करें। अब वे पैगम्बर के रूप में विख्यात हुए और इस्लाम धर्म की स्थापना की। 


इसके बाद मुहम्मद साहब ने शक्ति द्वारा इस्लाम का प्रचार करना आरंभ किया। 

गिबन के अनुसार , "उन्होंने एक हाथ मे तलवार तथा दूसरे में कुरान ग्रहण करके ईसाई तथा रोमन साम्राज्य के ऊपर अपना राज सिंहासन स्थापित किया।"


632 ई० में उनकी मृत्यु तक वे इसका प्रचार करते रहे। तथा उनकी मृत्यु के बाद इस्लाम के प्रचार की जिम्मेदारी  खलीफाओं ने सम्हाली।

खलीफा क्या है ? : 


मुहम्मद साहब ने अपना कोई उत्तराधिकारी नहीं चुना था अतः अरब के लोगों ने इस्लाम के प्रचार के लिए एक खलीफा पद बनाया और इसके लिए सबसे पहके अबू वक्र को चुना। अतः पैगम्बर मुहम्मद के उत्तराधिकारी ही खलीफा कहलाये।

 

प्रारंभिक खलीफा: 1. अबू वक्र
                           2. उमर
                           3. उसमान
                           4. अली


इस्लाम का विभाजन :


अधिकांश मुसलमान यह मानते है कि खलीफा का पद मुहम्मद साहब के परिवार और बिना परिवार से संबंधित दोनों व्यक्ति पा सकते हैं। उन्होंने उपरोक्त चारों खलीफाओं को एक मत से स्वीकार किया।

किन्तु कुछ प्रतिशत मुसलमानों का यह मानना था कि खलीफा सिर्फ मुहम्मद साहब के परिवार से संबंधित ही हो सकते हैं। उनका मानना था कि खलीफा (जिसे वह ईमाम भी कहते थे) स्वयँ भगवान के द्वारा आध्यात्मिक मार्गदर्शन पाता है। इनके अनुसार अली पहले ईमाम थे। 


इस प्रकार जो उपरोक्त चारों को खलीफा मानने वाले अधिकांश मुसलमान थे वे सुन्नी मुसलमान कहलाये कहलाये और जो आंशिक मुसलमान ये मानते थे कि पहले खलीफा अली हैं, क्योंकि वे पैगम्बर मुहम्मद के परिवार से सम्बंधित थे, वे शिया मुसलमान कहलाये। 

वर्तमान में इस्लाम इसी 2 शाखाओं में विभाजित रूप में विश्व भर में व्याप्त है। इनके मध्य परस्पर संघर्ष और बैर भाव हमेशा से ही रहा है। 

शिया और सुन्नी मुसलमानों के मध्य 680 ई० में खलीफा पद प्राप्त करने के लिए एक युद्ध हुआ जिसे कर्बला का युद्ध कहा जाता है। जिस दिन यह युद्ध हुआ इस्लामी कैलेंडर (हिज़री संवत) के अनुसार उसी दिन सुन्नी मुसलमान एक त्योहार मानते हैं जो मुहर्रम के नाम से विख्यात है। 


प्रारंभ से अभी तक लगभग 40 वर्षों तक खलीफा का पद अरब में ही रहा किन्तु अली के बाद कर्बला का युद्ध हुआ जिसके परिणामस्वरूप खिलाफत का पद सीरिया की राजधानी दमिश्क में चला गया। 


कर्बला का युद्ध : 


सुन्नियों के अनुसार चौथे और शियाओं के अनुसार पहले खलीफा अली के बाद उसका पुत्र हुसैन खलीफा बना। इसी बीच सीरिया के एक शासक खलीफा पद प्राप्त करना चाहता था। 


उसने शिया मुसलमानों के जरिये संदेश भेजा कि वह अली के पुत्र हुसैन से मिलना चाहता है। 

हुसैन अपनी एक छोटी सी सेना के साथ उससे मिलने के लिए गया। किन्तु सीरिया के शासक ने वहां पूर्णतः युद्ध की तैयारी किये हुए था। और दोनों के बीच एक भीषण युद्ध हुआ जिसे 'कर्बला का युद्ध' कहा जाता है। यह युद्ध 680 ई० में लड़ा गया था। 

इस युद्ध मे बगदाद के शासक ने धोके से हुसैन की हत्या कर दी।


जैसे ही हुसैन की हत्या का समाचार सुन्नियों को मिला वे शियाओं पर भड़क उठे और उनके प्रति आक्रामक हो गए। सुन्नियों का कहना था कि 'अगर शिया मुसलमान हुसैन को वहां न भेजते तो हुसैन की हत्या न होती , इसमें निश्चित ही शियाओं का हाथ था।'

किन्तु शियाओं का कहना था कि हुसैन की हत्या के पीछे शियाओं का कोई हाथ नहीं है तथा हुसैन ही हत्या का हमें भी दुख है। इसलिए शिया मुसलमान भी मुहर्रम का शोकपूर्ण त्योहार मनाते हैं। 

मुहर्रम क्यों मनाया जाता है ?


इसी युद्ध में हुसैन व उसकी सेना के निर्मम नरसंहार के कारण सुन्नी मुसलमान एक शोक का त्योहार "मुहर्रम" मानते हैं। बाद में शिया मुसलमान भी इसे मनाने लगे।

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Note : उपरोक्त article (लेख) विद्यार्थियों के लिए है इसका किसी भी धर्म विशेष की पारंपरिक मान्यताओं से कोई संबंध नहीं है। 

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धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


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