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26 January 2022

UPSC Syllabus in hindi | UPSC Prelims syllabus in hindi | UPSC Mains syllabus in hindi | UPSC Syllabus

 UPSC IAS Syllabus in hindi : हम जानते हैं कि UPSC IAS की परीक्षा देश की सर्वप्रतिष्ठित परीक्षा है। UPSC की परीक्षा के लिए देश के लाखों युवा अभ्यर्थी आवेदन करते हैं। किंतु लाखों में से कुछ ही (लगभग 1000) अभ्यर्थी Select होते हैं। इस परीक्षा को उत्तीर्ण करने वाले अभ्यर्थी देश के विभिन्न प्रशासनिक पदों पर नियुक्त होते हैं। 

IAS की इस प्रतिष्ठित परीक्षा को यूपीएससी आयोग द्वारा आयोजित की जाती है। यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (Union public service commission) द्वारा आयोजित भारतीय प्रशासनिक सेवा (Indian administrative service) भर्ती परीक्षा का संपूर्ण पाठ्यक्रम नीचे क्रमबद्ध तरीके से दिया गया है। 

Upsc syllabus in hindi


UPSC IAS Syllabus in hindi pdf : 


UPSC IAS Syllabus की इस पोस्ट के अंतर्गत UPSC prelims syllabus और UPSC mains syllabus को समझेंगे साथ ही साथ अंत में UPSC syllabus pdf दिया गया है जिसे आप Download करके प्रिंट आउट भी निकाल सकते हैं। इससे आप इसे प्रतिदिन देख सकेंगे। 


UPSC ias की तैयारी करने वाले सभी अभ्यर्थियों को चाहिए कि तैयारी (UPSC Preparation) के शुरुआत में ही upsc syllabus को अच्छी तरह समझ लें। इससे आप परीक्षा की वास्तविक आवश्यकताओं को समझ सकेंगे। 


UPSC IAS EXAM PATTERN : 


UPSC IAS Exam pattern : UPSC IAS की परीक्षा तीन चरणों से गुजरते हुए सम्पन्न होती है जिसमे पहला चरण होता है UPSC Prelims. इसके बाद इस चरण के उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को UPSC Mains से होकर गुजरना पड़ता है। तथा सबसे अंतिम चरण UPSC Interview का होता है। इसमें उम्मीदवार की Personality test की जाती है कि वह देश के जिस प्रशासनिक पद पर बैठने जा रहा है उस योग्य वास्तव में है भी या नहीं। 

इस प्रकार UPSC IAS EXAM के तीन चरण (3 Stages) निम्नलिखित हैं―


1. Prelims (UPSC Preliminary exam)

2. Mains (UPSC Mains exam)

3. Interview (UPSC Personality test) 


UPSC IAS Prelims Syllabus & Exam pattern : 


UPSC IAS की प्रतिष्ठित परीक्षा का प्रथम चरण UPSC Prelims होता है। यह एक प्रकार का शुरुआती चरण है जिसके अंतर्गत सभी उम्मीदवारों को 2 papers देने होते हैं। अर्थात UPSC IAS PRELIMS के अंतर्गत 2 परीक्षाएं होती हैं। ये निम्नलिखित हैं- 


1. General Studies 

2. CSAT 


ये दोनों पेपर वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्नों (Objective type questions) से युक्त होते हैं। अर्थात इसमें objective questions होते हैं। इनके प्रश्नों व निर्धारित समय का विवरण नीचे दिया गया है- 


 इनमें से General Studies वाले पेपर से Mains के लिए Cut-Off का निर्धारण होता है जबकि CSAT वाला पेपर Qualifying nature का होता है। अर्थात CSAT में केवल 33% अंक प्राप्त करना अनिवार्य होता है। जबकि General studies के आधार पर आगे के Mains के लिए मेरिट बनती है। 


UPSC Prelims General studies Syllabus : 


UPSC PRELIMS में General studies का पेपर शुरुआती paper है। जैसा कि ऊपर बताया गया है कि इस परीक्षा में 100 वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्न होते हैं जोकि 200 अंको के होते हैं। इसके लिए 2 घण्टे का समय उम्मीदवारों को दिया जाता है। आईये इसके Syllabus को समझते हैं कि इस परीक्षा में किस किस सेगमेंट से प्रश्न पूछे जाते हैं- 


UPSC Prelims Syllabus in hindi : General studies


राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व की सामयिक घटनाएं।

भारत का इतिहास और भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन ।

भारत एवं विश्व भूगोल भारत एवं विश्व का प्राकृतिक, सामाजिक, आर्थिक भूगोल

भारतीय राज्यतन्त्र और शासन संविधान, राजनैतिक प्रणाली, पंचायती राज, लोक नीति, अधिकारों संबंधी मुद्दे, आदि।

आर्थिक और सामाजिक विकास सतत विकास गरीबी समावेशन, जनसांख्यिकी, सामाजिक क्षेत्र में की गई पहल आदि।

पर्यावरणीय पारिस्थितिकी जैव-विविधता और मौसम परिवर्तन संबंधी सामान्य मुद्दे, जिनके लिए विषयगत विशेषज्ञता आवश्यक नहीं है।

सामान्य विज्ञान


UPSC Prelims CSAT Syllabus : 


UPSC CSAT के अंतर्गत भी Objective type के 80 प्रश्न पूछे जाते हैं। इन 80 प्रश्नों के 200 अंक होते हैं। अर्थात एक प्रश्न के 2.5 अंक होते हैं। इस पेपर के लिए भी 2 घंटे की अवधि दी जाती है। हम जानते हैं कि यह प्रश्नपत्र एक प्रकार का अर्हक पेपर (Qualifying exam) होता है।  जिसके लिए 33% (66 marks) अंक प्राप्त करने होते हैं।आईये अब देखते हैं कि इस परीक्षा में किस किस सेगमेंट से प्रश्न पूछे जाते हैं- 


UPSC Prelims Syllabus : CSAT


बोधगम्यता


संचार कौशल सहित अंतर वैयक्तिक कौशल


तार्किक कौशल एवं विश्लेषणात्मक क्षमता


निर्णय लेना और समस्या समाधान


सामान्य मानसिक योग्यता


आधारभूत संख्यनन (संख्याएं और उनके संबंध, विस्तार क्रम आदि) (दसवीं कक्षा का स्तर). आकड़ों का निर्वचन (चार्ट, ग्राफ, तालिका आकड़ों की पर्याप्तता आदि दसवीं कक्षा का . स्तर)


UPSC Mains syllabus in hindi : 

25 January 2022

महमूद गजनवी का सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण | Invasion of Mahmud gazanavi in 1025-26 | Somnath mandir par akraman

महमूद गजनवी भारत पर अनेकों बार (लगभग 17 बार) आक्रमण किया तथा भारत से विपुल धन संपदा लूट कर ले गया। महमूद ग़जनवी के आक्रमण और महमूद के आक्रमण के भारत पर प्रभाव के बारे में हम पिछले लेखों में बात कर चुके हैं। जिसे आप नीचे दी गयी लिंक से जाकर पढ़ सकते हैं।  यहां हम आज महमूद गजनवी द्वारा किया गया सोमनाथ मंदिर के आक्रमण को जानने का प्रयास करेंगे। क्योंकि उसके द्वारा किये गए 17 आक्रमणों में से सबसे प्रसिद्ध ही सोमनाथ मंदिर का आक्रमण ही था। 

आईये जानते हैं महमूद गजनवी का सोमनाथ पर आक्रमण को- 


सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण : 1025-26 


 महमूद का सबसे अधिक प्रसिद्ध आक्रमण (1025-26 ई.) में सोमनाथ के मंदिर पर हुआ। यह सुविख्यात शैव मंदिर, गुजरात में समुद्र तट पर स्थित था, जो अपनी अतुल रत्न और स्वर्ण के लिए प्रसिद्ध था। महमूद ने इस मंदिर को लूटने के उद्देश्य से 1025 ई. में मुल्तान और सिन्ध राजपूताना के मरुस्थल के मार्ग से गुजरात की ओर गया और मार्ग में छिटपुट विरोध का सामना करता हुआ सोमनाथ मंदिर के समीप 1026 ई. में पहुँच गया। कई दिन के घेरे के उपरान्त महमूद का गढ़ में प्रवेश हो गया और हजारों हिन्दुओं की हत्या कर दी और मंदिर को विध्वंस करा दिया तथा मूर्ति तोड़ दी गयी।


लूट की सामग्री के साथ जब वह अपने सैनिकों सहित वापस लौट रहा था तब धार के राजा भोज ने उसका मार्ग रोककर उसे दण्ड देने की योजना बनाई महमूद को जब इसकी सूचना मिली तो वह कच्छ की खाड़ी के उथले पानी को मँझाकर उस पार चला गया और राजा भोज देखता रह गया। महमूद को अपनी इस लौटती यात्रा में अनेक कष्ट हुए। उसका बहुत सामान जाटों ने लूट लिया, बहुत से सैनिक तथा घोड़े-ऊँट मर गये और सुल्तान स्वयं थक गया। परन्तु गज़नी पहुँचने पर उसने जश्न मनाया। विदित हो कि पंजाब के बाहर (सोमनाथ पर आक्रमण) उसका अंतिम अभियान था।


महमूद ने जाटों के विरुद्ध प्रतिशोध की भावना से 1027 ई. में अंतिम आक्रमण किया और उनकी बस्तियाँ जला दी, स्त्रियों और बच्चों को दास बना लिया। महमूद का बीमारी के कारण सन् 1030 ई. में गज़नी में मृत्यु हो गयी।


महमूद को आक्रमणकारी और लुटेरा कहकर उपेक्षा करना अनुचित है। गज़नवी के पंजाब और मुल्तान के आक्रमण ने उत्तरी भारत की राजनीतिक स्थिति में आमूल परिवर्तन कर दिया। उत्तर-पश्चिम से भारत को सुरक्षा प्रदान करने वाली पर्वत श्रृंखलाओं को तुर्कों ने पार कर लिया था और वे गंगाघाटी की मध्यभूमि पर किसी भी समय गंभीर आक्रमण कर सकते थे। इस काल में भारत के अतिरिक्त मध्य एशिया में तीव्र गति से परिवर्तन होने के कारण तुर्क लोग 150 वर्षों से भी इस क्षेत्र में अपने आक्रमण कर विस्तार करने में असफल ही रहे।


महमूद की मृत्यु के साथ-साथ सल्जूक नामक एक शक्तिशाली साम्राज्य अस्तित्व में के आया। जिसमें सीरिया, ईरान और मावरा उन्नहर सम्मिलित थे। इस साम्राज्य ने खुरासान पर आधिपत्य जमाने के लिए गज़नवियों से संघर्ष किया। जिसमें महमूद का पुत्र मसूद पराजित हुआ और उसने लाहौर में शरण ली गज़नी साम्राज्य अब गज़नी और पंजाब तक ही सीमित रह गया। फिर भी गज़नवियों ने गंगाघाटी के आक्रमण और लूटपाट का क्रम जारी रखा राजपूत लोग भारत पर होने वाले भारी सैनिक खतरे का सामने करने की स्थिति में नहीं थे। उत्तर भारत में एक ही समय में कुछ नये राज्यों का उदय हुआ, जो गज़नियों के आक्रमण का सामना कर सकते थे।  


धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक तृतीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


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21 January 2022

महमूद गज़नवी के आक्रमण का भारत पर प्रभाव | Mahmood gazanavi ke akraman ke prabhav | Invasion of mahmud ghazni upsc

 महमूद गजनवी एक तुर्क आक्रमणकारी था जिसने भारत पर कुल 17 बार आक्रमण किया। था महमूद गज़नवी के आक्रमण के विषय में हम पिछले लेख में विस्तार से बता चुके हैं आप इस लेख को पढ़ने के पूर्व उसे पढ़ लें क्योंकि यहां पर हम महमूद गज़नवी के आक्रमण के प्रभाव के बारे में बात करेंगे। 


महमूद गजनवी के भारत पर आक्रमण के प्रभाव : effects of mahmud ghazni's invasion in hindi


महमूद गजनवी के आक्रमण के परिणाम विभिन्न स्तरों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देखे जा सकते हैं। इन प्रभावों को हम बिन्दुवत् समझ सकते हैं―


प्रत्यक्ष प्रभाव : महमूद गजनवी के आक्रमण का भारत पर प्रभाव


➠ राजनैतिक क्षेत्र में महमूद के आक्रमणों के प्रत्यक्ष परिणाम महत्वपूर्ण नहीं माने जा सकते। महमूद का न तो भारत में साम्राज्य निर्माण का उद्देश्य था, न उसने भारत में कोई स्थायी राज्य बनाने का प्रयास किया। उसका एकमात्र उद्देश्य धन की प्राप्ति थी। अप्रत्यक्ष रूप से आक्रमण ने उत्तर भारत के राजनैतिक जीवन को प्रभावित किया। इन आक्रमणों के पूर्व उत्तरी भारत और तुर्कों द्वारा अधिकृत मध्य एशिया के क्षेत्र के बीच हिन्दुकश पर्वतमाला एक भौगोलिक विभाजन रेखा के रूप में थी परन्तु अब तुर्कों की सत्ता उत्तरी भारत में पंजाब के राज्य तक स्थापित हो गयी।


महमूद के आक्रमण के आर्थिक परिणाम महत्वपूर्ण सिद्ध हुए। महमूद भारत से के काफी मात्रा में धन लूटकर ले गया जिसका उपयोग उसने मध्य एशिया में साम्राज्य निर्माण में किया। महमूद भारत से अनेक कुशल कारीगर अपने साथ ले गया था, जिन्होंने अपनी कलाकृतियों द्वारा महमूद को अपनी राजधानी गज़नी को एक सुन्दर और समृद्ध नगर का रूप दिया, जिसके कारण गज़नी की ख्याति सर्वत्र फैली। 


➠ दूसरी ओर भारत के लिए ये आक्रमण आर्थिक क्षति का कारण सिद्ध हुए क्योंकि धन कई पीढ़ियों से मंदिरों में चढ़ावे के लिए और राजमहलों से भेंट और कर के रूप में संचित होता चला आ रहा था। वह महमूद द्वारा भारत से लूटकर ले जाया गया। इसके अतिरिक्त महमूद के आक्रमणों ने लगभग तीस वर्षों तक उत्तरी भारत में अस्थिरता का वातावरण बनाए रखा जिससे इस क्षेत्र में आर्थिक विकास में अवरोध उत्पन्न हुआ। 


➠ महमूद के आक्रमणों के सैनिक परिणाम भी महत्वपूर्ण सिद्ध हुए। महमूद को भारत से युद्ध के लिए हाथियों की उपयोगिता का ज्ञान हुआ। वह अपने साथ कुशल महावत भी ले गया। इनका उपयोग मध्य एशिया के युद्धों में सफलतापूर्वक किया।


➠ महमूद के आक्रमणों के परिणाम सांस्कृतिक जीवन में भी देखे जा सकते है। यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से इनका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन अप्रत्यक्ष और दूरगामी प्रभाव अवश्य पड़े। प्रत्यक्ष रूप से महमूद के कार्य नकारात्मक थे। उसने मंदिरों को लूटा, मूर्तियों का विनाश किया, नगरों को नष्ट किया, लूट-पाट हत्या की, परन्तु इन कार्यों से न तो हिन्दू धर्म का विनाश संभव था और न ही भारत में इस्लाम की स्थापना।


निष्कर्ष : 


 जैसा कि मुहम्मद हबीब ने सही लिखा है कि, महमूद ने भारत में जो कार्य किए वे निश्चित रूप से इस्लाम के उपदेशों के अनुसार नहीं थे और न ही उसने इस्लाम की कोई सेवा की, बल्कि उसने अपने इन कार्यों से इस्लाम धर्म का दुरूपयोग ही किया। 


अप्रत्यक्ष प्रभाव : महमूद गजनवी के आक्रमण के प्रभाव 


अप्रत्यक्ष रूप से आक्रमण ने इस्लामी और हिन्दू संस्कृति के बीच सम्पर्क में योगदान दिया। महमूद का दरबारी इतिहासकार अलबरूनी, जिसने भारतीय संस्कृति का अध्ययन किया। उसकी रचना 'तहकीकाते-हिन्द' हिन्दुस्तान की सच्ची तस्वीरे बयां करती है। इसी के साथ आक्रमणों ने पंजाब तक मध्य एशिया से आने वाले यात्रियों का मार्ग सुगम हो गया और अनेक सूफी सन्तों का भारत में प्रवेश हुआ। इस सांस्कृतिक सम्पर्क ने आगे चलकर एक नई समन्वित सांस्कृतिक परम्परा का विकास संभव बनाया। 


इस प्रकार हम देखते हैं कि महमूद गजनवी के भारत पर आक्रमण के राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से प्रभाव न तो प्रत्यक्ष थे और महत्वपूर्ण थे किंतु आर्थिक रूप से भारत पर काफी प्रभाव पड़े। आर्थिक रूप से प्रभाव भारत पर दीर्घकालिक थे क्योंकि महमूद गज़नवी के आक्रमण का उद्देश्य ही धन लूटना और मंदिरों को नष्ट करना था। 


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धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक तृतीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


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19 January 2022

प्राचीन भारतीय इतिहास के साहित्यिक स्रोत के रूप में जैन साहित्य का योगदान/महत्व | Jain texts as a historical sources

 प्राचीन भारतीय इतिहास के ऐतिहासिक स्रोत के रूप में साहित्यिक स्रोत , पुरातात्विक स्रोत तथा विदेशी विवरण तीनों का सामान योगदान कहा जा सकता है। हम जानते हैं कि साहित्यिक स्रोत के अंतर्गत दो प्रकार के साहित्य आते हैं- 1. धार्मिक साहित्य ; 2. धर्मेत्तर साहित्य। 

धार्मिक साहित्य के अंतर्गत प्राचीन भारत के तीनों धर्मों (हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म व जैन धर्म) के साहित्य आते हैं। सभी धर्मों के धार्मिक ग्रंथों में हमें उसकी धार्मिक विषयवस्तु के अलावा तत्कालीन इतिहास की भी झलक मिलती है जिससे इसका प्रयोग इतिहासकार ऐतिहासिक स्रोत के रूप में करते हैं। 


ऐतिहासिक स्रोत के रूप में जैन ग्रंथ/जैन साहित्य : 


ब्राह्मण व बौद्ध धर्मों के ग्रंथों के जैसे ही जैन धर्म के ग्रंथ भी भारतीय इतिहास का मार्गदर्शन करते हैं। जैन ग्रंथों में हमें प्राचीन काल (जिस काल में वे लिखे गए) की घटनाओं की जानकारियां मिलती हैं जिससे इसकी महत्ता ऐतिहासिक स्रोत के रूप में साबित होती है। 

नीचे इस article में हम इन ग्रंथों व उनसे प्राप्त सामग्रियों पर बात करते हुए इसके महत्व को समझने का प्रयास करेंगे। 


जैन ग्रंथ


साहित्यिक स्रोत के रूप में जैन ग्रंथो का योगदान : 


जैन साहित्य : जैन धार्मिक ग्रन्थ भी महत्त्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत के रूप में उपलब्ध है। जैन धार्मिक ग्रन्थों में भगवती सूत्र, भद्रबाहुचरित्र, पुण्याश्रत कथाकोष आदि प्रमुख हैं। जैन साहित्य में सबसे महत्त्वपूर्ण बारह अंग हैं। इनमें आचारांग सूत्र में जैन भिक्षुओं के आचार नियमों का उल्लेख है।

 भगवती सूत्र में महावीर के जीवन पर कुछ प्रकाश डाला गया है। इन बारह अंगों में प्रत्येक का उपांग भी हैं। इन पर अनेक भाष्य लिखे गए जो नियुक्ति, चूर्णि, टीका कहलाते हैं। भगवती सूत्र में सोलह महाजनपदों का भी विवरण मिलता है। भद्रबाहुचरित्र से चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्यकाल की घटनाओं की कुछ जानकारी प्राप्त होती है। सबसे महत्त्वपूर्ण जैन ग्रन्थ हेमचन्द्र कृत परिशिष्ट पर्व है जिसकी रचना ईसा की बारहवीं शताब्दी में हुई।


पूर्व मध्यकाल (लगभग 600 से 1200 ई.) में रचित जैन कथाकोषों और पुराणों जैसे हरिभद्र सूरि (705 से 775 ई.) द्वारा रचित समरादित्यकथा, धूर्ताख्यान और कथाकोश, उद्योतन सूरि (778 ई.) द्वारा रचित कुवलयमाला, सिद्धर्षिसूरि (605 ई.) द्वारा रचित उपमितिभव प्रपंच कथा, जिनेश्वर सूरि द्वारा रचित कथाकोषप्रकरण और नवीं शताब्दी ईसवी में जिनसेन द्वारा रचित आदि पुराण और गुणभद्र ने उत्तर पुराण में से तत्कालीन भारतीय समाज की सामाजिक और धार्मिक दशा की जानकारी मिलती है। 


धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक तृतीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


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18 January 2022

प्राचीन भारतीय इतिहास के साहित्यिक स्रोत के रूप में बौद्ध साहित्य का महत्व | Bauddha granth Aitihasik srot | बौद्ध ग्रंथ : ऐतिहासिक स्रोत

 


ब्राह्मण ग्रन्थों के समान ही भारतीय इतिहास के साधन के रूप में बौद्ध साहित्य का विशेष महत्व है। सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रन्थ त्रिपिटक हैं। इनके नाम हैं-सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्मपिटक। 


गौतम बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने करने बाद इनकी रचना हुई। • सुत्तपिटक में बुद्ध के धार्मिक विचारों और वचनों का संग्रह है। • विनयपिटक में बौद्ध संघ के नियमों का उल्लेख है और • अभिधम्मपिटक में बौद्ध दर्शन का विवेचन है। त्रिपिटक में ईसा से पूर्व की शताब्दियों में भारत के सामाजिक व धार्मिक जीवन पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। तीनों पिटकों की भाषा 'पाली' है। 


बौद्ध ग्रन्थों में जातकों का दूसरा प्रमुख स्थान है। जातकों में बुद्ध के पूर्वजन्मों की काल्पनिक कथाएँ हैं। इनमें 549 कथाएँ हैं। लंका के इतिवृत्त महावंश और दीपवंश भी भारत के प्राचीन इतिहास पर बहुत प्रकाश डालते हैं। परन्तु इन दोनों ही ग्रन्थों में कपोलकल्पित और अतिरंजित सामग्री बहुत है। दीपवंश की रचना सम्भवत: चौथी और महावंश की पाँचवीं शताब्दी में हुई। दीपवंश और महावंश से मौर्यकाल के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है। 


मिलिन्दपन्हो में यूनानी राजा मिनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन का दार्शनिक वार्तालाप है। इसमें ईसा की पहली दो शताब्दियों के उत्तर-पश्चिमी भारत के जीवन की झलक भी देखने को मिलती है। दिव्यावदान में अनेक राजाओं की कथाएँ हैं। इसमें अनेक अंश चौथी शती ई. तक जोड़े गए। आर्य-मंजु-श्री-मूल-कल्प में बौद्ध दृष्टिकोण से गुप्त सम्राटों का वर्णन मिलता है। प्रारम्भिक बौद्ध धार्मिक साहित्य से हमें प्राचीन भारत के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन की जानकारी तो मिलती ही है, छठी शती ई. पू. की राजनीतिक दशा का भी पर्याप्त वर्णन उपलब्ध होता है। 


इस प्रकार हम देखते हैं कि बौद्ध साहित्य प्राचीन भारत की एक संपुष्ट सामग्री प्रदान करते हैं। आज तक के शोधों और बौद्ध साहित्य की उपयोगिता को देखते हुए यह निश्चित ही कहा जा सकता है कि अगर बौद्ध ग्रंथ ऐतिहासिक सामग्रियां न प्राप्त होती तो हमारा इतिहास (विशेषकर प्राचीन इतिहास) इतना परिष्कृत व पुष्ट न होता।  


धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक तृतीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


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17 January 2022

बोगजकोई अभिलेख | Bogaj koi inscription in hindi | Bogajkoi abhilekh | बोगजकोई अभिलेख की खोज

 बोगजकोई एशिया माइनर (वर्तमान-तुर्की) का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। बोगजकोई की महत्ता इसलिए है कि इसी स्थान से विश्व का प्राचीनतम अभिलेख प्राप्त हुआ था जिसे इतिहास में बोगजकोई अभिलेख (Bogajkoi inscription) के नाम से जाता है। यह अभिलेख विश्व का प्राचीनतम अभिलेख इसलिए है कि इसे विद्वानों ने 1400 ई०पू० का बताया है। आईये जानते हैं इस अभिलेख के बारे में बहुत कुछ बातें- 

बोगजकोई अभिलेख


बोगजकोई अभिलेख | बोगजकोई अभिलेख की खोज 


एशिया माइनर (तुर्की) से प्राप्त 1400 ईसा पूर्व का अभिलेख जिसे 1907 ईस्वी में वींकलर महोदय (Hugo Winkler) द्वारा खोजा गया। यह कीलक लिपि (कीलाक्षर लिपि) तथा संस्कृत भाषा में है। इसमें चार वैदिक देवताओं-इन्द्र, मित्र, वरुण, नास्त्य (अश्विन कुमार) का उल्लेख मिलता है। इसी अभिलेख के आधार पर ही विद्वानों ने मध्य एशिया से भारत में आर्यों के आगमन का मत प्रतिपादित किया।


यह एक अभिलेख के रूप में है जो 14वीं शताब्दी ईसा पूर्व में प्रमाणित हुए। एशिया माइनर में खुदाई में मिले इस अभिलेख में दो राजाओं (हित्तियों के राजा सुपिफिल्यस-1 व मिस्र के राजा मितानी) के बीच हुए संधि को मजबूत करने का उल्लेख है। इन उपरोक्त देवी देवताओं को इस संधि के साक्षी के रूप में इस अभिलेख में उल्लेख किया गया है। 


यद्यपि भारत के सबसे प्राचीन अभिलेख हडप्पा मुहरों पर अंकित लेख हैं, परन्तु उनका अर्थान्वेषण अभी तक नहीं किया जा सका है। अतः भारत के प्राचीनतम अभिलेख जिसे पढ़ा जा सका है, मौर्य सम्राट अशोक के हैं जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के हैं। 


सन् 1906-07 ईस्वी में ह्यूगो वींकलर महोदय ने प्राचीन कालीन हिट्टाइट राज्य की राजधानी, जिसे बोगजकोई नाम से जाना जाता है, से मिट्टी की पट्टिकाओं में वैदिक कालीन भारतीय देवी देवताओं- इन्द्र, मित्र, वरुण, नास्त्य (अश्विन कुमार) का उल्लेख प्राप्त किया। इसके बाद से विद्वानों में इस बात को लेकर अवधारणा बन गयी कि आर्य भारत में ईरान से आये थे। विद्वानों ने बोगजकोई स्थान को आर्यों का मार्ग बताया। किन्तु बता दें कि कुछ विद्वान इस मत को स्वीकार नहीं करते हैं क्योंकि आर्यों के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं है जिससे यह ज्ञात हो कि आर्य बोगजकोई से आये थे या आर्यों का बोगजकोई स्थल से कोई संबंध ही हो। आप आर्यों का भारत आगमन की पोस्ट पढ़कर इस विषय में अधिक जानकारियां पा सकते हैं। 


इस प्रकार भारत व विश्व के इतिहास में बोगजकोई अभिलेख का अपने में काफी महत्वपूर्ण स्थान है। 


16 January 2022

भारतीय संविधान का प्रारूप | Draft of Indian Constitution in hindi | प्रारूप समिति | भारतीय संविधान की प्रारूप समिति

भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत संविधान है। हम जानते हैं कि इसके तैयार होने में भारतीयों को कड़ी मेहनत करनी पड़ी। भारतीय संविधान का विकास 1773 के Regulating act से होती है और यह भारत शासन अधिनियमों से होते हुए अंततः 1946 के कैबिनेट मिशन तक जाता है। 

जब भारतीय संविधान का निर्माण प्रारम्भ हुआ था तो बहुत सी प्रक्रियाओं के बाद इसके प्रारूप तैयार करने की बारी आई। प्रारूप तैयार करने के लिए एक 7 सदस्यीय प्रारूप समिति का गठन किया गया। इसके सदस्य- डॉ० भीमराव अम्बेडकर (अध्यक्ष), एन. गोपालस्वामी आयंगर, के.एम. मुंशी, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर, सैयद मो. सादुल्ला, बी.एल. मित्र तथा डी. पी. खेतान थे। 


भारतीय संविधान का प्रारूप कैसे और किसने तैयार किया था?

भारतीय संविधान का प्रारूप


आज के इस article में हम भारतीय संविधान के प्रारूप पर तथा प्रारूप समिति पर ही चर्चा करेंगे। क्योंकि इस सेक्शन से प्रतियोगी परीक्षाओं में बहुत बार प्रश्न पूछ लिए जाते हैं। 

 आईये जानते हैं―


भारतीय संविधान का प्रारूप | भारतीय संविधान की प्रारूप समिति


➤ संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने एक प्रारूप समिति का गठन किया था जिसके अध्यक्ष थे - डा. भीमराव अम्बेडकर और जिसमें 6 अन्य सदस्य थे।


➤ प्रारूप समिति को संविधान सभा की अनेक समितियों के प्रतिवेदनों (Reprots) पर लिए गए निर्णयों के अनुसार संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए कहा गया था। इन समितियों में प्रमुख थी- संघीय अधिकार समिति, संघीय संविधान समिति, प्रांतीय संविधान समिति, मूल अधिकारों आदि विषयक परामर्श समिति आदि।

संविधान सभा ने यह भी निर्देश दिया था कि कुछ मामलों में 1935 के भारत शासन कानून का पालन किया जाये।


➤ वास्तव में संविधान का प्रारम्भिक प्रारूप सभा के संवैधानिक सलाहकार के कार्यालय द्वारा तैयार किया गया था, जिसका निरीक्षण और आवश्यक संशोधन करके प्रारूप समिति ने भारत के संविधान के प्रारूप को अन्तिम रूप प्रदान किया। 


➤ यह प्रारूप फरवरी 1948 में संविधान सभा के अध्यक्ष को सौंप दिया गया। इसमें कुल मिलाकर 315 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां (Schedules) थी। इस प्रारूप को प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित किया गया ताकि इस पर बुद्धिजीवी अपनी प्रतिक्रियाएँ, आलोचनाएं व्यक्त कर सकें और अपने सुझाव दे सकें।


➤ 29 अगस्त 1947 को डा. अम्बेडकर द्वारा विधिवत यह प्रारूप संविधान सभा में विचारार्थ प्रेषित किया गया।


➤ इसे प्रेषित करते समय डा० अम्बेडकर ने इसकी प्रमुख विशेषताओं पर थी प्रकाश डाला जो इस प्रकार थी–


(1) इस प्रारूप के अनुसार भारत में संसदीय शासन प्रणाली की स्थापना का प्रावधान था।


(2) इसके अन्तर्गत भारतीय राज्य का संगठन संघात्मक बनाने का प्रयोजन था परन्तु संघात्मक प्रतिमान से हटकर इसमें कुछ विशेष प्रावधान थे जैसे दोहरी नागरिकता का न होना, संविधान संशोधन के लिए सरल पद्धति का अपनाया जाना, एकल न्यायपालिका, दीवानी और फौजदारी कानून की पूरे देश में एकरूपता, अखिल भारतीय सेवाएं आदि। 


उपरोक्त विशेषताओं के बावजूद भारतीय संविधान के प्रारूप में तीन प्रकार की आलोचनाएं की गयी/की जाती हैं। आईये इन आलोचनाओं को जानने का प्रयास करते हैं- 


भारतीय संविधान के प्रारूप की आलोचनाएं : 


संविधान के प्रारूप के सम्बन्ध में तीन प्रकार की आलोचनाएं व्याप्त थीं 

(1) इस प्रारूप में कोई मौलिकता नहीं है।

(2) लगभग आधा प्रारूप 1935 के भारत शासन कानून की प्रतिलिपि मात्र है, 

(3) शेष विश्व के अन्य संविधानों से नकल किया हुआ है। 


भारतीय संविधान के प्रारूप को प्रमुख पत्र पत्रिकाओं तथा अखबारों में, विद्वतजनों की प्रतिक्रियाओं या आलोचनाओं को जानने के लिए, प्रकाशित करने के बाद मुख्य रूप से यही तीन प्रकार की आलोचनाएं की गयी। जिसके बाद डॉ० भीमराव अंबेडकर ने इनके उत्तर दिए जिससे कि सभी आलोचक संतुष्ट हो सकें। 


आलोचनाओं के उत्तर : 


इन आलोचनाओं का उत्तर देते हुए डा० अम्बेडकर ने प्रश्न किया कि "20वीं सदी के मध्य में क्या कोई एकदम मौलिक संविधान निर्मित किया जा सकता है?"


दूसरे यह आरोप भी निराधार है कि संविधान दूसरे संविधानों की नकल मात्र है। 

डा. अम्बेडकर ने कहा कि संविधान के मूल सिद्धान्त किसी के कॉपीराइट नहीं हैं। प्रत्येक देश इन सिद्धान्तों को अपनी आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार अपना सकता है। इसमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती। 

इस प्रकार इनके उत्तर डॉ० अम्बेडकर द्वारा दिये गए। 


इसके बाद क्या हुआ ? 


संविधान के प्रारूप पर सामान्य विचार विमर्श होने के उपरान्त उसके अनुच्छेदों पर विचार हुआ और उन्हें अपनाया गया। अन्त में पुनः पूरे संविधान पर सामान्य विचार विमर्श हुआ। 


➤ प्रारूप समिति ने संविधान के मूल पाठ पर विचारोपरान्त उसे 21 फरवरी 1948 को संविधान सभा के समक्ष विचार के लिए, रखा जिसमें कुल 315 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ थी। संविधान सभा द्वारा संविधान के प्रारूप में संशोधन हेतु बड़ी संख्या में टिप्पणियाँ आलोचनायें और सुझाव दिया गया। जिस पर विचार के पश्चात पुनः 26 अक्टूबर 1948 को संविधान का प्रारूप प्रारूप समिति ने संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत किया।


तत्पश्चात इस प्रारूप की प्रतिलिपियाँ संविधान सभा के सदस्यों को प्रदान की गयी। संविधान सभा में इस प्रारूप पर तीन वाचन (विचार-विमर्श) सम्पन्न हुए। यथा


प्रथम वाचन 4 नवम्बर, 1948 से 9 नवम्बर 1948 तक चला। 

दूसरा वाचन 15 नवम्बर 1948 से 17 अक्टूबर -1949 तक चला।


दूसरे वाचन में संविधान के प्रत्येक खण्ड पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया। तत्पश्चात 7635 संशोधन प्रस्तुत किये गये जिसमें से 2437 को स्वीकार कर लिया गया। इस वाचन की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि सभी प्रश्नों पर निर्णय लगभग पूर्ण सहमति से लिये गये। यह वाचन संविधान के 7वें अधिवेशन से 10वें अधिवेशन तक चला।


तीसरा वाचन- 14 से 26 नवम्बर 1949 तक चला।


➤ डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान को पारित करने का प्रस्ताव रखा। 26 नवम्बर 1949 को यह प्रस्ताव पारित हुआ तथा इसी दिन संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान को अंगीकार (Adopted) कर लिया गया और संविधान सभा के 284 उपस्थित सदस्यों ने संविधान पर हस्ताक्षर किया। इसमें महिला सदस्यों की संख्या आठ (8) थी। इसमें श्रीमती सरोजनी नायडू, हंसा मेहता और दुर्गाबाई देशमुख प्रमुख थीं। 


➤ इस प्रकार भारतीय संविधान के निर्माण के निमित्त कुल 11 अधिवेशन हुए और 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा, जिसमें संविधान के प्रारूप पर कुल 114 दिन बहस हुई।


➤ भारतीय संविधान के पारित (अंगीकृत Adopt) होने की तिथि 26 नवम्बर 1949 है। इस समय संविधान में कुल 395 अनुच्छेद 8 अनुसूचियाँ तथा 22 भाग थे।


➤ संविधान सभा की अन्तिम बैठक (12वीं बैठक ) 24 जनवरी 1950 को हुई। इसी दिन सदस्यों ने संविधान पर अन्तिम रूप से हस्ताक्षर किया तथा डा० राजेन्द्र प्रसाद को भारत का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया और संविधान सभा भंग कर उसे अन्तरिम संसद में परिवर्तित कर दिया गया।


➤ संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को हुई थी। उस दिन संविधान पर सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किये गये। तीन प्रतियाँ तैयार की गई थी। एक एक हस्तलिखित अंग्रेजी व हिन्दी में, एक छपी हुई अंग्रेजी में सदस्यों को तीनों पर हस्ताक्षर करने के लिये कहा गया था।


26 जनवरी 1950 संविधान को लागू करने की तिथि निश्चित की गई क्योंकि 20 वर्ष पूर्व इसी दिन लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की मांग की घोषणा की थी। 


धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र: इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


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15 January 2022

लौकिक साहित्य | ऐतिहासिक स्रोत | धर्मेत्तर साहित्य | Non-religuous text of historical sources

लौकिक साहित्य किसे कहते हैं  | धर्मेत्तर साहित्य 

लौकिक साहित्य


लौकिक साहित्य को धर्मेत्तर साहित्य भी कहा जाता है। ये ऐसे साहित्य या ग्रंथ होते हैं जो किसी धर्म विशेष से संबंध नही रखते हैं। अर्थात ऐसे ग्रंथो की विषयवस्तु कोई धार्मिक विषय न होकर किसी व्यक्ति की जीवनी , व्याकरण, प्रशासनिक ग्रंथ या किसी वंश विशेष का इतिहास होता है। हम जानते हैं कि धर्मेत्तर साहित्य से हटकर धार्मिक ग्रंथ भी होते हैं जिनकी विषयवस्तु किसी धर्मविशेष पर आधारित होती है। किंतु हम देखते हैं कि धर्मेत्तर या लौकिक साहित्यिक रचनाएं किसी धर्मविशेष से प्रभावित नही होती हैं। ऐसे साहित्यिक ग्रंथ भारत मे प्राचीन काल से ही लिखे जाते रहे हैं। लिहाजा इन ग्रंथों में अपने मूल आधारभूत बातों के अलावा हमें उनके रचना के समय की घटनाओं या सामाजिक आर्थिक स्थितियों की भी जानकारी मिल जाती है। इतिहासकार ऐसे ग्रंथों का उपयोग ऐतिहासिक सामग्री के लिए करता है इस प्रकार ये हमारे लिए ऐतिहासिक स्रोत की भूमिका भी निभाते हैं।


 लौकिक साहित्य के अन्तर्गत ऐतिहासिक एवं अर्द्ध-ऐतिहासिक ग्रन्थों तथा जीवनियों का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है जिनसे भारतीय इतिहास जानने में काफी मदद मिलती है। 


ऐतिहासिक ग्रंथ :


ऐतिहासिक रचनाओं में सर्वप्रथम उल्लेख " अर्थशास्त्र का किया जा सकता है जिसकी रचना चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमन्त्री सुप्रसिद्ध राजनीतिज्ञ कौटिल्य (चाणक्य) ने की थी। मौर्यकालीन इतिहास एवं राजनीति के ज्ञान के लिये यह ग्रन्थ एक प्रमुख स्रोत है। इससे चन्द्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था पर प्रचुर प्रकाश पड़ता है। 

कौटिल्यीय अर्थशास्त्र के अनेक सिद्धान्तों को सातवीं-आठवीं शताब्दी ईस्वी में कामन्दक ने अपने "नीतिसार" में संकलित किया। इस संग्रह में दसवीं शताब्दी ईस्वी के राजत्व सिद्धान्त तथा राजा के कर्तव्यों पर प्रकाश पड़ता है। 

ऐतिहासिक रचनाओं में सर्वाधिक महत्व कश्मीरी कवि कल्हण द्वारा रचित "राजतरंगिणी" का है। यह संस्कृत साहित्य में ऐतिहासिक घटनाओं के क्रमबद्ध इतिहास लिखने का प्रथम प्रयास है। इसमें आदिकाल से लेकर 1151 ई0 के आरम्भ तक के कश्मीर के प्रत्येक शासक के काल की घटनाओं का क्रमानुसार विवरण दिया गया है। 


कश्मीर की ही भांति गुजरात से भी अनेक ऐतिहासिक ग्रन्थ प्राप्त होते है जिनमें सोमेश्वर कृत रसमाला तथा कीर्तिकौमुद्री, मेरुतुंग कृत प्रवन्धचिन्तामणि, राजशेखर कृत प्रबन्धकोश आदि उल्लेखनीय हैं। इनसे हमें गुजरात के चौलुक्य वंश का इतिहास तथा उसके समय की संस्कृति का के अच्छा ज्ञान प्राप्त हो जाता है । 


इसी प्रकार सिंन्ध तथा नेपाल से भी कई इतिवृत्तियां (Chronicles) मिलती हैं जिनसे वहाँ का इतिहास ज्ञात होता है।

सिन्ध की इतिवृत्तियों के आधार पर ही "चचनामा" नामक ग्रन्थ की रचना की गयी जिसमें अरबों की सिन्ध विजय का वृत्तान्त सुरक्षित है। मूलतः यह अरवी भाषा में लिखा गया तथा कालान्तर में इसका अनुवाद खुफी के द्वारा फारसी भाषा में किया गया। अरब आक्रमण के समय सिन्ध की दशा का अध्ययन करने के लिये यह सर्वप्रमुख ग्रन्थ है। नेपाल की वंशावलियों में वहाँ के शासकों का नामोल्लेख प्राप्त होता है, किन्तु उनमें से अधिकांश अनैतिहासिक हैं। 


अर्द्ध-ऐतिहासिक ग्रंथ : 


अर्द्ध-ऐतिहासिक रचनाओं में पाणिनि की अष्टाध्यायी, कात्यायन का वार्त्तिक, गार्गीसंहिता, पतंजलि का महाभाष्य, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस तथा कालिदासकृत मालविकाग्निमित्र आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।


      पाणिनि तथा कात्यायन के व्याकरण-ग्रन्थों से मौर्यो के पहले के इतिहास तथा मौर्ययुगीन राजनीतिक अवस्था पर प्रकाश पड़ता है। पाणिनि ने सूत्रों को समझाने के लिए जो उदाहरण दिये हैं उनका उपयोग सामाजिक-आर्थिक दशा के ज्ञान के लिये भी किया जा सकता है। इससे उत्तर भारत के भूगोल की भी जानकारी होती है।

      गार्गीसंहिता, यद्यपि एक ज्योतिष-ग्रन्थ है तथापि इससे कुछ ऐतिहासिक घटनाओं की सूचना मिलती है। इसमें भारत पर होने वाले यवन आक्रमण का उल्लेख मिलता है जिससे हमें पता चलता है कि यवनों ने साकेत, पंचाल, मधुरा तथा कुसुमध्वज (पाटलिपुत्र) पर आक्रमण किया था। 

      पतंजलि पुष्यमित्र शुंग के पुरोहित थे। उनके महाभाष्य से शुंगों के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। 

      मुद्राराक्षस से चन्द्रगुप्त मौर्य के विषय में सूचना मिलती है। 

      कालिदास कृत 'मालविकाग्निमित्र' नाटक शुंगकालीन राजनीतिक परिस्थितियों का विवरण प्रस्तुत करता है।


ऐतिहासिक जीवनियाँ : 


ऐतिहासिक जीवनियों में अश्वघोषकृत बुद्धचरित, बाणभट्ट का हर्षचरित, वाक्पति का गौडवहो, विल्हण का विक्रमाङ्कदेवचरित, पद्यगुप्त का नवसाहसाङ्कचरित, सन्ध्याकर नन्दी कृत "रामचरित", हेमचन्द्र कृत "कुमारपालचरित" (द्वयाश्रयकाव्य), जयानक कृत "पृथ्वीराजविजय" आदि का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है। 

"बुद्धचरित" में गौतम बुद्ध के चरित्र का विस्तृत वर्णन हुआ है। 

"हर्षचरित" से सम्राट हर्षवर्धन के जीवन तथा तत्कालीन समाज एवं धर्म-विषयक अनेक महत्वपूर्ण सूचनायें मिलती हैं। 

गौडवहो में कन्नौजनरेश यशोवर्मन् के गौड़नरेश के ऊपर किये गये आक्रमण एवं उसके बध का वर्णन है। 

विक्रमाङ्कदेवचरित में कल्याणी के चालुक्यवंशी नरेश विक्रमादित्य षष्ठ का चरित्र वर्णित है।

नवसाहसाँकचरित में धारानरेश मुञ्ज तथा उसके भाई सिन्धुराज के जीवन की घटनाओं का विवरण है।

'रामचरित' से बंगाल के पालवंश का शासन, धर्म एवं तत्कालीन समाज का ज्ञान होता है।

आनन्दभट्ट कृत बल्लालचरित से सेन वंश के इतिहास और संस्कृति पर प्रकाश पड़ता है। 

कुमारपालचरित में चौलुक्य शासकों- जयसिंह सिद्धराज तथा कुमारपाल का जीवन चरित तथा उनके समय की घटनाओं का वर्णन है।

पृथ्वीराजविजय से चाहमान (चौहान) राजवंश के इतिहास का ज्ञान होता है। इसके अतिरिक्त और भी जीवनियां है जिनसे हमें प्रचुर ऐतिहासिक सामग्री मिल जाती है। 

राजशेखरकृत प्रबन्धकोश, बालरामायण तथा काव्यमीमांसा - इनसे राजपूतयुगीन समाज तथा धर्म पर प्रकाश पड़ता है।


दक्षिण भारत के लौकिक साहित्य : 


उत्तर भारत के समान दक्षिण भारत से भी अनेक तमिल ग्रन्थ प्राप्त होते है जिनसे वहाँ शासन करने वाले विभिन्न राजवंशों के काल का इतिहास एवं संस्कृति का ज्ञान होता है। 

तमिल देश का प्रारम्भिक इतिहास 'संगम-साहित्य से ज्ञात होता है। नन्दिक्कलम्बकम्, कलिंगत्तुषर्णि, चोलचरित आदि के अध्ययन से सुदूर दक्षिण में शासन करने वाले पल्लव तथा चोल वंशों के इतिहास एवं उनकी संस्कृति का ज्ञान होता है। 

कलिंगत्तुपर्णि में चोल सम्राट कुलोत्तुंग प्रथम की कलिंग विजय का विवरण सुरक्षित है। 

तमिल के अतिरिक्त कन्नड़ भाषा में लिखा गया साहित्य भी हमें उपलब्ध होता है। इसमें महाकवि पम्प द्वारा रचित 'विक्रमार्जुन विजय' (भारत) तथा रन्न कृत 'गदायुद्ध' विशेष महत्व के हैं। इनसे चालुक्य तथा राष्ट्रकूट वंशों के इतिहास पर कुछ प्रकाश पड़ता है। 


धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक तृतीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


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14 January 2022

छठी शताब्दी ई०पू० का इतिहास | History of 600 BC in hindi | महाजनपद काल | Mahajanpada period

 छठी सदी ईसा पूर्व (600 B.C.) का काल भारतीय इतिहास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण समय था। इसका महत्व इस कारण से भी है क्योंकि भारत का गौरवपूर्ण इतिहास के रूप में राजनीतिक इतिहास की शुरुआत 6ठी सदी ई०पू० से ही होती है।


महाजनपद काल :


 इस काल में भारत राजनीतिक रूप से 16 इकाइयों में बंटा हुआ था इन्हें हम 16 महाजनपद कहते हैं। इन्ही महाजनपदों के कारण ही इस काल को इतिहासकारों ने महाजनपद काल कहकर संबोधित किया। 


बौद्ध काल | महात्मा बुद्ध का काल : 600 ई०पू० 


छठी सदी ई०पू० में ही भारत की धार्मिक स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन हुआ। क्योंकि इस समय तक आते आते पूर्व के वैदिक कर्मकांडो में इतनी जटिलता आ गयी थी और सामाजिक ढांचा इतना दोषपूर्ण होता जा रहा था कि इनके परिणामस्वरूप दो नए धर्म उभरकर सामने आए। हालांकि इन धर्मों के उद्भव के कारणों के बारे में हम किसी अलग लेख में विस्तार से चर्चा करेंगे। किन्तु यहां इतना समझना आवश्यक है कि बौद्ध और जैन धर्मों के उदय ने इस काल को धार्मिक दृष्टि से महात्मा बुद्ध का काल (Buddha period) या बौद्ध काल भी कहा जाता है। इसे जैन काल भी उतना ही प्रासंगिक और सही है जितना कि बौद्ध काल कहना।


द्वितीय नगरीकारण का काल : 


इस समय हम देखते हैं कि हङप्पा सभ्यता के बाद दूसरी बार नगरीकरण का स्वरूप हमें भारत में देखने को मिलता है। इसके कई कारण इतिहासकारों ने माने हैं किंतु अभी किसी भी एक कारण पर सहमति न बन पाने के कारण विवाद की स्थिति बनी हुई है। जो भी हो यह काल भारतीय इतिहास का द्वितीय नगरीकरण का काल (Second urbanisation) कहलाता है। 


इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय इतिहास के इस काल (युग) को हम छठी सदी ई०पू० का काल, बुद्ध काल, महाजनपद काल, द्वितीय नगरीकरण का काल तथा NBPW (उत्तरी काले पॉलिसदार मृदभांड) संस्कृति का काल आदि नामों से जानते हैं। 


छठी शताब्दी ईसा पूर्व का भारत : 

महाजनपद काल


यहां हम इस लेख के माध्यम से छठी सदी ई०पू० की राजनीतिक , सामाजिक , आर्थिक , धार्मिक व सांस्कृतिक स्थितियों का वर्णन करेंगे। इतिहास के इस कालखंड से सभी Exams में प्रश्न आते रहे हैं अतः इस article में बताई गई जानकारियां सभी परीक्षाओं की दृष्टि से उपयोगी होंगी। 


छठी सदी ई०पू० का राजनीतिक इतिहास | राजनीतिक जीवन 


षोडस महाजनपद- उत्तर वैदिक काल के अन्त तक आर्य जनों अथवा कबीलों के परिभ्रमण का युग समाप्तप्राय हो गया और वे विशिष्ट प्रदेशों में बस कर 'जनपदों' का रूप धारण करने लगे। छठी शताब्दी ई० पू० के उत्तरार्द्ध में, जब मगध में बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ और पश्चिमोत्तर प्रदेश पर नवोदित हखामनी साम्राज्य के आक्रमण प्रारम्भ हुए, समस्त भारत ऐसे ही जनपदों में विभाजित था। 


इनमें सोलह जनपदों को उनके महत्त्व के कारण 'महाजनपद' कहा जाने लगा था। अनेक बौद्ध और जैन ग्रन्थों में 'षोडस महाजनपदों' की सूची मिलती है। बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय के अनुसार ये महाजनपद थे—अंग, मगध, काशी, कोसल, मल्ल, वज्ञ्जि, वत्स, चेदि, कुरु, पंचाल, मत्स्य, शूरसेन, अवन्ति, गन्धार, कम्बोज और अश्मक । इनमें कुछ की शासन व्यवस्था गणतन्त्रात्मक थी और शेष की राजतन्त्रात्मक । गणतन्त्र राज्यों में बज्जि और मल्ल संघ प्रमुख थे और राजतन्त्रों में कोसल, वत्स, अवन्ति और मगध । ये राजतन्त्र एक ओर परस्पर संघर्षरत थे तो दूसरी ओर गणतन्त्रों को आत्मसात करने की चेष्टा कर रहे थे। इनमें सफलता अन्ततोगत्वा मगध महाजनपद को प्राप्त हुई 


मगध का उत्कर्ष | Rise of magadha in hindi 


मगध के उत्कर्ष का प्रारम्भ हर्यक कुल के नरेश श्रेणिक बिम्बिसार (543-490 ई० पू०) से होता है। वह गौतम बुद्ध और महावीर का समकालीन था । उसने अपनी राजधानी गिरिव्रज के स्थान पर राजगृह में स्थापित की। कोसल, लिच्छवि, विदेह तथा मद्र राज्यों से विवाह सम्बन्ध करके अपनी स्थिति को दृढ किया और अंग पर विजय प्राप्त करके मगध राज्य के विस्तार को द्विगुणित किया।


 उसके बाद उसके महत्त्वाकांक्षी पुत्र कुणिक अजातशत्रु ने कोसल से सफल संघर्ष किया और वज्जि तथा मल्ल गणराज्यों को पराजित कर आत्मसात किया। 


उसके बाद पाटलिपुत्र के संस्थापक उदायिन् और उसके उत्तराधिकारियों ने और तदनन्तर शिशुनागवंशीय राजाओं ने राज्य किया। इस बीच में मगध ने एक-एक करके वत्स, अवन्ति और कोसल आदि को अधिकृत कर लिया था। 


मगध के साम्राज्य का और विस्तार नन्दवंश के संस्थापक महापद्मनन्द के शासन काल में हुआ। पुराणों के अनुसार के वह बहुत लोभी परन्तु बलवान और परशुराम के समान क्षत्रियों का संहार करने वाला था। उसने इक्ष्वाकु, पंचाल, कौरव, हैहय एकलिंग, शूरसेन मिथिला तथा अन्यान्य राज्यों को जीतकर हिमालय और विन्ध्य के बीच एकच्छत्र राज्य किया। उसके अन्तिम उत्तराधिकारी धननन्द के समय पश्चिमोत्तर भारत पर एलेक्जेण्डर का आक्रमण हुआ जिससे उत्पन्न अव्यवस्था और असन्तोष का लाभ उठाकर चन्द्रगुप्त मौर्य नामक एक साहसी राजकुमार ने अपने गुरु चाणक्य की सहायता से अपनी शक्ति बढ़ा ली और 322 ई० पू० में मगध को अधिकृत कर लिया और फिर दौर शुरू हुआ मौर्य वंश का। 


छठी शताब्दी ई०पू० के धर्म और दर्शन : Religions of 600 BC.


 उत्तर वैदिक काल में यज्ञधर्म के दुरूह और व्ययशील में हो जाने और निवृत्तिमार्गी आर्येतर विचारधाराओं के प्रभाव के कारण उपनिषदीय दर्शन का उदय हुआ था। परन्तु उपनिषदों का अमूर्त ब्रह्म और शुष्क उपासना विधि सामान्य जनों के लिए रुचिकर नहीं थे। इसलिए उपनिषदीय दर्शन के साथ कुछ ऐसे सम्प्रदाय भी उदित हुए जो जनमानस के अनुकूल थे। ये सम्प्रदाय दो प्रकार के थे।

 एक वे जिन्होंने वैदिक धर्म का खुला प्रतिरोध न कर किसी पुराने देवता अथवा देवी को केन्द्र बनाकर नये सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया और दूसरे वे जो वैदिक धर्म का खुला प्रतिरोध करने लगे। पहले वर्ग के सम्प्रदायों में वैष्णव और शैव सम्प्रदाय उल्लेखनीय हैं।


शैव सम्प्रदाय व वैष्णव सम्प्रदाय : शैव सम्प्रदाय का उदय उत्तर वैदिक काल में ऋग्वेदिक रुद्र द्वारा सैन्धव 'शिव' के तत्त्व आत्मसात कर लेने पर हुआ। श्वेताश्वतर उपनिषद् की रचना होने तक शिव 'महादेव' माने जाने लगे थे । 

     वैष्णव सम्प्रदाय के सर्वोच्च देवता विष्णु की महत्ता के चिह्न खुद ऋग्वेद में मिलते हैं । उत्तर वैदिक काल में कुछ लोग उन्हें सर्वोच्च देवता मानते थे । उस समय उनका सम्बन्ध भक्ति के स्थान पर यज्ञधर्म से अधिक था। लेकिन वेदोत्तर काल में उनको नारायण और वासुदेव कृष्ण से अभिन्न माना जाने लगा, जिससे यह सम्प्रदाय भक्तिमार्गी होने लगा। इस सम्प्रदाय के प्रमुख ग्रन्थ गीता की रचना सम्भवतः छठी पाँचवी शताब्दी ई० पू० में हुई थी। इसमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए निष्काम कर्मयोग का उपदेश वर्णित है।


जैनधर्म: 


 वेद विरोधी धर्म में सर्वप्रथम जैनधर्म का उल्लेख होता चाहिए। 

पार्श्वनाथ – जैनियों के अनुसार उनके चौबीस तीर्थकर हुए हैं जिनमें तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की ऐतिहासिकता प्रायः मानी जाती है। वह सम्भवतः नवीं शती ई०पू० में आविर्भूत हुए थे। उन्होंने वेदों की अपौरुषेयता का खण्डन तथा अहिंसात्मक यज्ञों और जाति- व्यवस्था का विरोध किया और अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना) तथा अपरिग्रह (सम्पत्ति त्याग) पर बल दिया। छठी शताब्दी ई० पू० में भगवान् महावीर ने उनके द्वारा प्रवर्तित मत को संशोधित कर के जैनधर्म का रूप दिया


महावीर स्वामी : 

जीवन और उपदेश महावीर का जन्म 568 ई० पू० में वैशाली के समीप स्थित कुण्डग्राम के एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था। लिच्छवि गणाध्यक्ष चेटक की बहिन त्रिशला उनकी माता थीं। तीस वर्ष की आयु में उन्होंने गृहत्याग किया और तदुपरान्त तेरह वर्ष तक तपस्या करके जम्भियग्राम के निकट शालवृक्ष के नीचे 'कैवल्य' ज्ञान प्राप्त किया। अपनी आयु के शेष वर्ष (मृत्यु 527 ई० पू०) उन्होंने कोसल, अंग, वज्जि, मगध और अन्य राज्यों में धर्म प्रचार और जैन संघ को सुसंगठित करने में लगाए । उनका कहना था कि सभी सांसारिक सुख नश्वर और दुःखमूलक हैं। इस दुःख का मूल है तृष्णा और तृष्णा का मूल है कर्म का बन्धन।

 इस बन्धन से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने त्रिरत्न का उपदेश दिया। पहला रत्न है सम्यक् आचरण इसके अन्तर्गत उन्होंने पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह के साथ ब्रह्मचर्य को जोड़ दिया। दूसरा रत्न है सम्यक श्रद्धा, जिसके द्वारा जीव अर्थात् आत्मा, जो संख्या में अनेक हैं, अजीव अथवा भौतिक पदार्थ के बन्धन से मुक्ति पाते हैं। तीसरा रत्न है सम्यक ज्ञान महावीर के अनुसार ज्ञान की अनेक कोटियाँ होती हैं, इसलिए कोई भी दृष्टिकोण न पूर्णतः ठीक होता है न पूर्णतः गलत इस सिद्धान्त को स्यादवाद या अनेकान्तवाद कहते हैं। 

● महावीर स्वामी की जीवनी


बौद्धधर्म:


छठी सदी ई०पू० में ही जैन धर्म के समकालीन एक अन्य वेद विरोधी धर्म उद्भूत हुआ जिसे हम बौद्ध धर्म के नाम से जानते हैं। इसके प्रवर्तक महात्मा बुद्ध थे। 


महात्मा बुद्ध-

महावीर के समकालीन धर्मसुधारक गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई० पू० में आधुनिक गोरखपुर के समीप स्थित लुम्बिनी नामक वन में हुआ था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के 'राजा' थे। अनुश्रुतियों के अनुसार गौतम को राजपुत्रोचित शिक्षा मिली और विवाह यशोधरा अथवा गोपा नामक राजकुमारी से हुआ । लेकिन गौतम की आसक्ति सांसारिक सुखों में न थी 26 वर्ष की आयु में उन्होंने गृहत्याग कर दिया और आलार कालाम तथा रुद्दक रामपुत्त आदि धर्माचार्यों के पास रहकर साधना की और तदनन्तर उरुवेला के वन में छः वर्ष कठोर तप किया।


 लेकिन इनसे भी उनके मन को शान्ति नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने तपश्चर्या का परित्याग कर दिया और एक नवीन परन्तु सरलतर साधना प्रारम्भ की। इस बार वह सफल हुए और उन्हें गया के समीप एक वृक्ष के नीचे 'सम्बोधि' प्राप्त हुई। तब से वे 'बुद्ध' कहलाए। अपने जीवन के शेष 45 वर्ष उन्होंने भी धर्म प्रचार में व्यतीत किए। सबसे पहला उपदेश उन्होंने सारनाथ (वाराणसी) में दिया था। इस घटना को 'धर्म-चक्र प्रवर्तन' कहा जाता है। उनके शिष्यों और श्रद्धालु भक्तों में बिम्बिसार, अजातशत्रु, प्रसेनजित, उपालि, सारिपुत्त, मौद्गल्यायन तथा आनन्द आदि प्रसिद्ध है । ८० वर्ष की आयु में कुशीनगर के समीप उनका परिनिर्वाण' हुआ ।

● गौतम बुद्ध की जीवनी


बौद्ध धर्म के सिद्धांत : 


 उनके अनुसार मुख्य समस्या दुःख की समस्या है जिस पर विचार कर के उन्होंने चार आर्य सत्यों का प्रतिपादन किया । ये हैं दुःख, दुःख समुदय, दुःख निरोध तथा दुःख-निरोध का मार्ग।


(1) दुःख– भगवान् बुद्ध के अनुसार विश्व दुःखों से परिपूर्ण है। जन्म, जरा, के व्याधि और मृत्यु सभी दुःख हैं। जो बातें हमें सुखमय लगती हैं वे भी क्षणिक होने के कारण दुःख का कारण होती हैं


(2) दुःख-समुदाय– बुद्ध ने दुःख की समस्या पर प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धान्त के आलोक में विचार किया। इस सिद्धान्त के अनुसार हर कार्य का कोई न कोई कारण होता है। इस सिद्धान्त को दुःख की समस्या पर लागू करके उन्होंने घोषित किया कि दुःख का मूल कारण है अविद्या जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य अपने को शरीर या मन से अभिन्न मानकर रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श तथा भावनाओं में आसक्त हो जाता है। इससे दृष्णा का उदय होता है जिसके फल उसे अपने बन्धन में जकड़ लेते हैं।


(3) दु:ख-निरोध– प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धान्त के अनुसार यदि कारण को दूर कर दिया जाय तो फल अपने आप दूर हो जाता है वैसे ही जैसे रोग के कारण का निरोध कर देने पर रोग चला जाता है। इसलिए दुःख को दूर करने के लिए यह आवश्यक है कि दुःख के कारण- -अविद्या, तृष्णा और कर्म के बन्धन को दूर किया जाय ।


(4) दुःख-निरोध का मार्ग– बुद्ध के अनुसार अविद्या, तृष्णा और कर्म के बन्धनों को शील, समाधि और प्रज्ञा स्कन्धों द्वारा दूर किया जा सकता है। शील अर्थात् करुणा, अहिंसा तथा मैत्री आदि से कर्म नियन्त्रित होते हैं तथा समाधि से मन में एकाग्रता आती है जिससे तृष्णा का अन्त होता है। मन की एकाग्रता से प्रज्ञा का उदय भी होता है जिससे अविद्या तिरोहित हो जाती है।


अन्य सम्प्रदाय–


 वेदोत्तर काल में उपर्युक्त सम्प्रदायों के अतिरिक्त अन्य अनेक सम्प्रदायों का आविर्भाव हुआ। इनमें चार्वाक और आजीवक विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 

चार्वाक वेदों की अपौरुषेयता और कर्मकाण्ड के विरोधी तथा घोर भौतिकवादी थे। आजीवक सम्प्रदाय के संस्थापक मक्खलि पुत्र गोशाल थे। अभाग्यवश उनके उपदेशों का निष्पक्ष वर्णन करने वाला कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है, परन्तु उनके सम्प्रदाय की लोकप्रियता निर्विवाद है। इनके अतिरिक्त जैन और बौद्ध साहित्य में अजित केशकम्बलिन, पकुद्ध कवायन तथा सम्बय बेलद्वपुत्त अन्य अनेक धर्माचारियों का उल्लेख मिलता है। ये सब गौतम बुद्ध और महावीर के समकालीन थे। 


छठी शताब्दी ई०पू० का सामाजिक जीवन :


उत्तर वैदिक काल के अन्त तक भारतीय समाज की मूलभूत रेखाएँ स्पष्ट हो गई थीं। प्रारम्भिक वेदांग और सूत्र साहित्य की रचना के समय इसको सुसंगठित रूप प्रदान किया गया। इन ग्रन्थों में आश्रम व्यवस्था और पुरुषार्थ सिद्धान्त, जो उत्तर वैदिक साहित्य में बीजरूपेण उल्लिखित हैं, पूर्णतः सुव्यवस्थित रूप में मिलते हैं।

    इसके अतिरिक्त इनमें चारों वर्गों के अधिकार और कर्तव्य भी सुनिश्चित कर दिये हैं। इस व्यवस्थापन में ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान मिला और शूद्रों को निम्नतम ऐसा प्रतीत होता है कि क्षत्रिय वर्ण ब्राह्मणों के उत्कर्ष से विशेष सन्तुष्ट नहीं था। इस प्रसंग में यह तथ्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि उपनिषद् दर्शन के प्रतिपादक और वर्ण व्यवस्था के विरोधी गौतम बुद्ध एवं महावीर क्षत्रिय थे। 


छठी शताब्दी ई०पू० का आर्थिक जीवन : 


प्रारम्भिक सूत्र अथवा बौद्धकाल में भी भारतीय संस्कृति प्रकृत्या ग्राम्य थी, यद्यपि मुद्रा प्रणाली, लोहे के आविष्कार एवं उद्योग धन्धों की उन्नति के कारण समृद्ध व्यापारी वर्ग अस्तित्व में आता जा रहा था और कौशाम्बी, चम्पा, राजगृह, वैशाली, श्रावस्ती, मथुरा तथा उज्जयिनी जैसे नगरों की संख्या बढ़ती जा रही थी।

 इन नगरों के श्रेष्ठ (सेठ) स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे थे। वे उधार लेते-देते थे, लेन-देन में हुण्डियों का प्रयोग करते थे और दूरस्थ नगरों में सार्थवाहों द्वारा माल भेजते थे। वे अपने लिए विशाल और भव्य भवन बनवाते थे। जातक कथाओं में अनेक स्थलों पर 'सत्त भूमक प्रासाद' (सात मज्जिल वाले मकान) का उल्लेख है। हाल ही में कौशाम्बी में उदयन के राजप्रासाद' के अवशेष उपलब्ध हो जाने से यह भी निश्चित हो गया है कि प्रारम्भिक बौद्धकाल में ही भारतीय भवन निर्माण में पाषाण का प्रयोग करने लगे थे और मेहराब के प्रयोग से परिचित हो गए थे। 


धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक तृतीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


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13 January 2022

Noun practice set | Advance level noun practice set | Noun practice questions for ssc exams

 Noun questions का यह तीसरा set है। इसके पूर्व हम 2 sets के प्रश्नों को देख चुके हैं जिनके लिंक नीचे दिए गए हैं आप इन्हें भी solve कर सकते हैं। ये प्रश्न परीक्षाओं की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। साथ ही इन्हें Solve करने से आप इस chapter Noun को पढ़ने के बाद अपने Knowledge को check कर सकते हैं। 


NOUN Exercise questions : 


Noun exercise questions आपकी आगामी परीक्षाओं जैसे SSC CGL, CHSL , Stenographer, MTS, CPO, CDS, UPSC आदि के लिए निश्चित रूप से उपयोगी सिद्ध होगी। 

Noun questions की महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह एक प्रकार का शुरुआती chapter है। हम जानते हैं कि parts of speech जोकि 8 होते हैं उनकी शुरुआत ही NOUN से होती है। और आगे के chapters भी बिना noun के ज्ञान के नही समझे जा सकते हैं। अतः इन सभी प्रश्नों को हल करें और इसका लाभ अवश्य लें। 


इन प्रश्नों के उत्तर नीचे दिए गए हैं। जिससे आप अपने उत्तर की जांच आसानी से कर सकते हैं। 


Noun practice set for ssc exams : 


1. One of the problem (A)/ with you (B)/ is that you do not (C)/ come in time. (D)/ No Error (E) 


2. He saw only (A)/ five police who (B)/ were running after (C)/ the criminals (D)/ No Error (E)


3. Mohan visited (a)/ Ramu’s and Shweta’s house (b)/ and found (c)/ the couple missing.(D)/ No error (E)


4. Arun is (a)/ one of my (b)/fast friend. (c)/no error (d)


5. The machineries (a)/in a great majority (b)/of our cotton mill is obsolete. (c)/no error (d) 


6. Miles after miles (a)/the road (b)/ran through (c)/a thick Equitorial forest. (d)


7. All the girls students (a)/ are going to (b)/ attend the (c)/ meeting at time.(d)


8. It is harmful to take (a)/ cupsful of tea (b)/ five times a day. (c)/ No error(d) 


9. He had given me (a)/ five breads to eat (b)/ because I was so hungry? (c)/ No error (d)


10.  I have an urgent work to do right now, (A)/ so call me (B)/ back after some times (C)/ No error (D).


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धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र: इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


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