भूगोल की शाखाएँ | क्रमबद्ध भूगोल एवं प्रादेशिक भूगोल | Systematic geography and Regional geography

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 यद्यपि पिछली पोस्ट्स के माध्यम से हम यह जान चुके हैं कि भूगोल (Geography) एक प्राचीन विज्ञान है जिसके अंतर्गत धरातल पर मिलने वाले विविध तत्वों का अध्ययन किया जाता है। 

 प्राचीन यूनानी विद्वान इरेटोस्थनीज ने ‘भूगोल’ (Geographia) का नामकरण करते हुए इसे एक विशिष्ट विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया तत्पश्चात हेरोडोटस (Herodotus) तथा रोमन विद्वानों स्ट्रेबो एवं टॉलमी ने इसे एक सुनिश्चित स्वरूप प्रदान किया।

भूगोल के विषय में इस पोस्ट को पढ़ने से पूर्व बेहतर होगा कि आप पिछली पोस्ट्स अवश्य देख लें जिसका लिंक अधोलिखित है–

भूगोल’ से संबंधित पोस्ट्स: अवश्य देखें

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उपरोक्त पोस्ट्स के बाद यहाँ अभी हम भूगोल का 2 शाखाओं के रूप में विद्वानों द्वारा किए गए विभाजन को समझेंगे तथा साथ ही भूगोल के अध्ययन की 2 विधियों को जानने का भी प्रयास करेंगे– तो आप इस महत्वपूर्ण लेख को पूरा अंत तक पढ़ें!

भूगोल की शाखाएं

भूगोल की 2 प्रमुख शाखाएं (अथवा) भूगोल के अध्ययन की 2 विधियां:- 

भूगोल के अध्ययन की दो विधियां हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो भूगोल के अध्ययन को विद्वानों ने 2 प्रमुख शाखाओं में वर्गीकृत किया है।

 अर्थात  भूगोल के अध्ययन के 2 प्रमुख उपागम हैं।

1. विषय वस्तुगत अथवा क्रमबद्ध भूगोल

2. प्रादेशिक भूगोल 

वूल्ड्रिज (Wooldrige) तथा ईस्ट (East) के अनुसार , “Geography may be persued by two methods or upon two levels, which may be distinguished as general (Or world) geography and special (Regional) geography.

विषय वस्तुगत या क्रमबद्ध भूगोल की विचारधारा जर्मनी के प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता अलेक्जेण्डर वान हम्बोल्ट (1769-1859 ई०) द्वारा प्रस्तुत की गई वहीं दूसरी ओर प्रादेशिक भूगोल का विकास एक अन्य जर्मन भूगोलवेत्ता कार्ल रिटर के द्वारा किया गया। 

क्रमबद्ध भूगोल / क्रमबद्ध विधि (Systematic method):- 

भूगोल के अध्ययन की क्रमबद्ध विधि में एक ही भौगोलिक कारक को लेकर समस्त विश्व अथवा विश्व के किसी भी भाग का अध्ययन किया जाता है। 

इस विधि के अनुसार भूगोल का अध्ययन इस प्रकार किया जाता है कि हमारा ध्यान भूगोल के किसी एक तत्व पर ही केन्द्रित होता है। धरातल, जल-प्रवाह, जलवाय, मृदा, वनस्पति, खनिज सम्पदा, कृषि, उद्योग, परिवहन, व्यापार, जनसंख्या आदि प्रमुख भौगोलिक तत्व हैं।

 इन तत्वों का क्षेत्र विशेष के संदर्भ में पृथक्-पृथक् अध्ययन किया जाता है। यह क्षेत्र कोई देश, महाद्वीप अथवा समस्त विश्व हो सकता है। 

इस विधि को प्रकरण विधि (Topical Approach) भी कहते हैं, क्योंकि इसमें अलग-अलग प्रकरण (Topic) या तत्व मिश्रण (Element Complex) का अध्ययन करके ही भूगोल का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। प्रसिद्ध भूगोलवेना रिचार्ड हार्टशॉर्न (Richard Hartshorme) के अनुसार

“क्रमबद्ध भूगोल के अध्ययन का सबसे साधारण तरीका यह है कि पृथ्वी के तल की असमानताओं पर किसी एक भौगोलिक तत्व के संदर्भ में विचार किया जाए।” 

कुछ भूगोलवेत्ता इसे सामान्य भूगोल (General Geography) के नाम से भी पुकारते हैं। क्रमबद्ध भूगोल के अध्ययन का यह लाभ है कि इसके द्वारा समस्त यथार्थता (Total Reality) के कुछ तत्वों का चयन कर लिया जाता है और उन चुने हुए तत्वों के विश्लेषण एवं वितरण पर ध्यान दिया जाता है।

2. प्रादेशिक विधि (Regional Approach) या प्रादेशिक भूगोल :-

 भूगोल का अध्ययन करने के लिए हम प्रायः भू-स्थान को विभिन्न प्रदेशों में विभाजित करते हैं। पृथ्वी के तल पर भौगोलिक दशाए सर्वत्र एक समान नहीं, अपितु विभिन्न भागों में विभिन्न होती हैं।

       इस विधि के अनुसार हमारे क्षेत्र की सीमाओं का पता चलता है, न कि भूगोल के तत्वों की सीमा का । भू-स्थल के विभिन्न भागों का गहन अध्ययन करने के लिए बड़े क्षेत्रों को छोटे क्षेत्रों में बांटा जाता है।  उदाहरणतया विश्व का अध्ययन करने के लिए संपूर्ण विश्व को प्राकृतिक खण्डों ( Natural Regions) में विभाजित किया जाता है। 

भूतल पर इतनी स्थानिक भिन्नताएं (Areal Differentiations) हैं कि कोई भी क्षेत्र किसी अन्य क्षेत्र जैसा नहीं होता। परन्तु कई बार पृथ्वी तल पर दूर स्थित प्रदेशों के भौगोलिक वातावरण में काफी समांगता (Homogeneity) देखने में आती है जिसके परिणामस्वरूप वहाँ पर मानव जीवन भी एक जैसा ही होता है। 

उदाहरणतया, उत्तरी अफ्रीका में स्थित सहारा मरुस्थल जैसा वातावरण हज़ारों किलोमीटर दूर स्थित दक्षिणी अफ्रीका के कालाहारी मरुस्थल, दक्षिणी अमेरिका के अटाकामा मरुस्थल, अरब के मरुस्थल, थार के मरुस्थल तथा आस्ट्रेलिया के मरुस्थल में भी पाया जाता है। अतः इन सभी भू-भागों को एक ‘प्राकृतिक खण्ड’ में सम्मिलित किया जाता है जिसे हम उष्ण मरुस्थलीय खण्ड कहते हैं।

 इन दूर स्थित प्रदेशों में भौगोलिक तथा मानवीय तत्व लगभग एक जैसे हैं। इन क्षेत्रों का एक मरुस्थलीय क्षेत्र के रूप में अध्ययन करना ही प्रादेशिक विधि है। 

इसी प्रकार, भारत का अध्ययन करने के लिए जब हम भारत को विभिन्न प्रदेशों में बाँट कर उसका अध्ययन करते हैं तो उसे भारत का प्रादेशिक भूगोल कहा जाता है। उदाहरणतया, यदि हम समस्त भारत को न लेकर गंगा का मैदान, छोटा नागपुर का पठार, असम की घाटी अथवा तटीय प्रदेश को लेकर उसकी स्थिति, धरातल, जलप्रवाह, जलवायु, मृदा, प्राकृतिक वनस्पति, खनिज सम्पदा, कृषि, उद्योग, यातायात, व्यापार तथा जनसंख्या आदि का अध्ययन करेंगे तो यह प्रादेशिक विधि होगी। इस प्रकार सारे विश्व या उसके किसी बड़े भाग को भौगोलिक प्रदेशों में विभाजित करके भौगोलिक अध्ययन करने की विधि को ‘प्रादेशिक अध्ययन विधि’ कहते हैं। 

इस विधि के अन्तर्गत भौगोलिक अध्ययन को ‘प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) कहते हैं।

 हार्टशॉर्न (Hartshorne) के अनुसार, “Regional geography is literally what its title expresses the description of the earth by portions of its surface.” 

इस प्रकार के अध्ययन के निम्नलिखित लाभ होते हैं:

1. इसके द्वारा भूगोल का अध्ययन अधिक सरल तथा प्रभावपूर्ण हो जाता है।

2. इसमें कारण तथा प्रभाव (Cause and Effect) का सम्बन्ध स्पष्ट दिखाई देता है।

3. भूगोल के मूल नियम भली-भाँति समझ में आ जाते हैं।

4. विभिन्न प्रदेशों के अध्ययन से उनके बीच होने वाली आर्थिक विषमताओं के कारण का पता चलता है।

5. क्योंकि क्षेत्र सीमित होता है इसलिए इस विधि द्वारा अध्ययन अधिक गहन हो सकता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि क्रमबद्ध विधि तथा प्रादेशिक विधि दोनों ही भूगोल के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। क्रमबद्ध विधि में हम अपने अध्ययन के लिए एक या एक से अधिक भौगोलिक तत्वों का चुनाव करते हैं तथा प्रादेशिक विधि में हमारा ध्यान केवल सम्बन्धित प्रदेश पर ही केन्द्रित होता है। 

हार्टशॉर्न के अनुसार, “Each of the specialized branches of geography is represented in both systematic and regional geography in systematic geography by separate studies of single element or element complexes, in regional geography by a part of a regional study, limited to a particular group of related aspects.” 

क्रमबद्ध भूगोल व प्रादेशिक भूगोल में अंतर:- 

विषय वस्तुगत भूगोल अथवा क्रमबद्ध भूगोल तथा प्रादेशिक भूगोल में कुछ मूलभूत अंतर दिखाई पड़ते हैं ये निम्नवत हैं–

क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography)

1. क्रमवद्ध भूगोल में किसी एक विशिष्ट भौगोलिक तत्व का अध्ययन होता है।

2. क्रमबद्ध विधि क्षेत्र का समाकलित (Integrated) रूप प्रस्तुत करती है।

3. यह विधि राजनैतिक इकाइयों पर आधारित होती है।

4. यह अध्ययन खोज व तथ्यों को प्रस्तुत करता है।

5. इस अध्ययन में एक घटक जैसे जलवायु के आधार पर विभिन्न प्रकार तथा उप-प्रकार निश्चित किए जाते हैं।

प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography)

1. प्रादेशिक भूगोल में किसी एक प्रदेश का सभी भौगोलिक तत्वों के संदर्भ में एक इकाई के रूप में अध्ययन होता है।

2. प्रादेशिक विधि एकाकी रूप प्रस्तुत करती है।

3. यह विधि भौगोलिक इकाइयों पर आधारित होती है।

4. यह अध्ययन किसी प्रदेश के वातावरण तथा मानव के बीच अंतसम्बन्ध प्रस्तुत करता है।

5. इस अध्ययन में प्रदेशों का सीमांकन किया जाता है। इसे प्रादेशीकरण कहते हैं।

निष्कर्ष:-

 इस प्रकार हम देखते हैं कि भूगोल के अध्ययन को विद्वानों ने 2 विधियों में वर्गीकृत किया है। इन दोनों माध्यमों से भूगोल का अध्ययन कर एक अच्छी समझ स्थापित की जा सकती है। 

अन्य पोस्ट्स : अवश्य देखें

धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

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