Origin of harappan civilization (हड़प्पा सभ्यता का उद्भव/उत्पत्ति) Indus Valley civilization in hindi | 3 Important topics

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Origin of harappan civilization : पाषाण युग की समाप्ति के बाद धातुओं के प्रयोग का युग प्रारम्भ हुआ।
सबसे पहले मनुष्य ने तांबे का प्रयोग किया, फिर काँसा तथा अन्ततः लोहा प्रयोग में लाया कोटा गया। किन्तु पाषाण उपकरणों का प्रयोग पूर्णतया बन्द नहीं हुआ तथा लम्बे समय तक मनुष्य ने ताँबे तथा पत्थर के उपकरणों का साथ-साथ प्रयोग किया। भारत के विभिन्न भागों में कई ऐसी संस्कृतियाँ प्रकाश में आई हैं जिनमें पत्थर तथा ताँबे का उपयोग साथ-साथ दिखाई देता है। इन्हें ताम्र पाषाणिक (Chalcolithic) कहा गया है। इनकी कालावधि अत्यन्त विस्तृत है। ये प्राक् हड़प्पा, हडप्पा तथा उत्तर हड़प्पा काल तक फैली हुई है।
Origin of harappan civilization
मोहनजोदड़ो का चित्र

सिंधु और उसकी सहायक नदियों के उपजाऊ मैदान में भारत की कांस्य काल की प्राचीन सभ्यता का उदय हुआ था जिसको सामान्यत: है ‘सिंधु सभ्यता’ (Indus civilization) कहा जाता है।
सिन्धु सभ्यता भारत की प्राचीनतम नगरीय सभ्यता है। उसका सम्बन्ध कांस्य काल से है।
यह सभ्यता पूर्ण विकसित तथा नगरी सभ्यता के रूप में प्रकाश में आई जो कि भारतवर्ष में प्रथम नगरीकरण को प्रमाणित करती है।
सिंधु घाटी सभ्यता एक विशिष्ट वातावरण में मानव जीवन के सर्वांगीण विकास को दर्शाती है।

“भारत प्रारम्भ से ही अनेक साधनों में उन्नति कर ली है वह साधनों से अनजान नहीं था अतः भारत को हम प्रारंभ से ही बालक के रूप में नहीं अपितु एक प्रौढ़ के रूप में देख सकते हैं, कहने का भाव यह है कि भारत के गौरवशाली इतिहास में हम भारत को हड़प्पा सभ्यता से ही एक विकसित रूप में देख रहे हैं। और न केवल सुंदर वस्तु की रचना की बल्कि आज की सभ्यता के उपयोगी और विशेष चिन्ह अच्छे हम्मानो और नालियों को भी तैयार किया है।”

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● सिन्धु घाटी सभ्यता के पुरास्थल(Sites of indus valley civilization)Part 3 |हड़प्पा(Harappa), मोहनजोदड़ो(Mohenjodaro)|हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख पुरास्थल

1. हड़प्पा सभ्यता की खोज:- (Discovery of harappan civilization):

 
बीसवीं शती के द्वितीय दशक तक पाश्चात्य विद्वानों की यह धारणा थी कि सिकन्दर के आक्रमण (ई. पू. 326) के पूर्व भारत में कोई सभ्यता ही नहीं थी। परन्तु इस शती के तृतीय दशक में इस भ्रामक धारणा का निराकरण हआ जबकि दो प्रसिद्ध पुरातत्व शास्त्रियों- -दयाराम साहनी तथा राखालदास बनर्जी ने हड़प्पा (पंजाब के मान्टगोमरी जिले में स्थित) तथा मोहनजोदड़ो (सिन्ध के लरकाना जिले में स्थित) के प्राचीन स्थलों से पुरावस्तुयें प्राप्त करके यह सिद्ध कर दिया कि परस्पर 640 किलोमीटर की दूरी पर बसे हुए ये दोनों ही नगर कभी एक ही सभ्यता के दो केन्द्र थे। पिगट महोदय ने इन्हें “एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वा राजधानियाँ” कहा है।

चार्ल्स मैसन (1826 ई.):

सर्वप्रथम एक ब्रिटिश यात्री चार्ल्स मैसन (Charles Masson) का ध्यान हड़प्पा स्थित टीलों की ओर गया। उसने 1826 ई. में इस स्थान की यात्रा की थी। उसने 1842 ई. में प्रकाशित अपने एक लेख नैरेटिव ऑफ जर्मनी (Narrative of Journeys) में इस बात का उल्लेख किया। उसका अंदाजा था कि ये टीले किसी पुराने राजमहल के अवशेष हैं।

अलेक्जेंडर बर्न्स (1831 ई.):

सन् 1831 ई. में जब कर्नल अलेक्जेण्डर बर्न्स पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह से मिलने जा रहा था तब उसकी नजर हड़प्पा स्थित टीले पर पड़ी थी। उसका अनुमान था कि ये टीले किसी पुराने किले के अवशेष हैं।

बर्टन बंधु (1856 ई.):

सन् 1856 ई. में जब जेम्स बर्टन James Burton) और विलियम बर्टन (William Burton) दो अभियंता बंधु कराची-लाहौर लाइन के लिए रेल बिछाने में लगे थे तो उन्होंने पास के टीलों से अपनी लाइन के लिए ईंटें लेने के प्रयत्न किये। ईंटों के लिए की गई खुदाई से उन्हें किसी प्राचीन सभ्यता के अस्तित्व का आभास हुआ।

अलेक्जेंडर कनिंघम 1853,1856,1875 ई.):

अलेक्जेंडर कनिंघम (Alexander Cunningham) ने 1853 एवं 1856 ई. में हड़प्पा की यात्रा की और वहाँ अनेक टीलों के गर्भ में किसी प्राचीन सभ्यता के दबे होने की संभावना व्यक्त की।
उन्हें स्थानीय निवासियों ने बताया कि यह टीला हजारों वर्ष पुराना है और शासक के अत्याचार से नगर नष्ट हो गया।

सन् 1875 ई. में कनिंघम ने पुरातात्विक सर्वेक्षण (Archaeological Surveyor) की हैसियत से हड़प्पा के बसाव (Settlement of Harappa) पर एक रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपी । उनका अनुमान था कि यहाँ महात्मा बुद्ध के जमाने या इण्डो-बैक्ट्रियन शासकों के जमाने की कोई बस्ती होगी।

जॉन मार्शल एवं उनके सहयोगी (1920 ई. का दशक):

अंततः 1921 ई. में दयाराम साहनी द्वारा हड़प्पा की खोज हुई। अगले वर्ष यानी 1922 ई. में राखाल दास (आर.डी.) बनर्जी ने मोहनजोदड़ो की खोज की। उस समय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रधान संचालक सर जॉन मार्शल थे और उन्हीं के निर्देश पर उनके सहयोगी दयाराम साहनी एवं राखाल दास बनर्जी ने खोज की थी।

 सन् 1924 ई. में जॉन मार्शल ने लंदन से प्रकाशित एक साप्ताहिक पत्र में इस सभ्यता की खोज के बारे में घोषणा की। जॉन मार्शल के अन्य सहयोगियों के नाम हैं- अर्नेस्ट मैके (चन्हुदड़ो-1925 ई.), ऑरेल स्टीन (सुत्कागेंडोर-1927 ई.)आदि । सिन्धु सभ्यता की खोज ने भारत को विश्व के मानचित्र पर अंकित कर दिया और उसे विश्व के प्राचीनतम सभ्यताओं की जन्म स्थली मेसोपोटामिया एवं मिस्र के समकक्ष ला खड़ा किया।
 सन् 1921 ई. में हड़प्पा की खोज से लेकर अब तक भारतीय उपमहाद्वीप में इस सभ्यता के लगभग 1500 स्थलों की खोज की जा चुकी है।
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के अन्वेषण और उत्खनन के बाद आज तक हजारों की संख्या में पुरास्थलों की खोज की जा चुकी है जिसमें हड़प्पा संस्कृति के
साक्ष्य मिले हैं।
हड़प्पा सभ्यता के पुरास्थल व उनके उत्खननकर्ता

2. हड़प्पा सभ्यता का नामकरण :-(Nomenclature of Harappan civilization)

इस सभ्यता के लिए साधारणतः तीन नामों का प्रयोग मिलता है-सिन्धु सभ्यता/सिन्धु घाटी की सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता और सिन्धु-सरस्वती सभ्यता।

सिन्धु सभ्यता/सिन्धु घाटी की सभ्यता:-
Indus civilization/Indus valley civilization:

 शुरू-शुरू में 1921 ई. में जब पश्चिमी पंजाब में हड़प्पा स्थल पर इस सभ्यता का पता चला और अगले ही वर्ष यानी 1922 ई. में. एक अन्य महत्वपूर्ण पूरास्थल मोहनजोदड़ो को खोजा गया , तब यह माना जाने लगा कि यह सभ्यता अनिवार्यतः सिन्धु नदी के घाटी तक सीमित है, क्योंकि उस समय तक सिंधु नदी घाटी के अलावा अन्य क्षेत्रों में पुरास्थल प्राप्त नहीं हुए थे।
 अतः इस सभ्यता का संकेत देने के लिए ‘सिंधु घाटी की सभ्यता’Indus valley civilization’ शब्दावली का प्रयोग शुरू हुआ। सिंधु घाटी की सभ्यता को संक्षेप में ‘सिंधु सभ्यता’ Indus civilization’ कहा जाने लगा। इस सभ्यता को सिंधु सभ्यता की संज्ञा सर्वप्रथम सर जॉन मार्शल ने दी। प्राचीनता की दृष्टि से इस सभ्यता का सर्वाधिक प्राचीन नाम ‘सिंधु सभ्यता’ है।

हड़प्पा सभ्यता: Harappan civilization

 बाद के वर्षों में जब अनुसंधान से यह प्रमाणित हुआ कि यह सभ्यता सिंधु घाटी तक ही सीमित नहीं है बल्कि उसकी सीमाओं के पार दूर-दूर तक फैली हुई है, तब इस सभ्यता के सही सही भौगोलिक विस्तार का संकेत देने के लिए उक्त शब्दावली अपर्याप्त सिद्ध हुई। अतएव इसके लिए ‘हड़प्पा सभ्यता’Harappan civilization’ नामकरण किया गया। इसके लिए पुरातत्व विज्ञान की परिपाटी (परंपरा) के आधार बनाया गया। पुरातत्व विज्ञान में यह परिपाटी है कि सभ्यता या संस्कृति का नामकरण उसके सर्वप्रथम ज्ञात स्थल के नाम पर किया जाता है इस सभ्यता का सर्वप्रथम ज्ञात स्थल था-हड़प्पा, सो इस सभ्यता का नाम रखा गया-हड़प्पा सभ्यता। परंपरा की दृष्टि से इस सभ्यता का सर्वाधिक उपयुक्त नाम हड़प्पा सभ्यता है।

सिन्धु-सरस्वती सभ्यता: Indus- saraswati civilization

चूंकि हड़प्पा सभ्यता का विस्तार सिन्धु घाटी क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि उसके परे भी है, इसलिए कुछ विद्वान इसे ‘सिन्धु सरस्वती सभ्यता की संज्ञा देते हैं। अभी तक भारतीय उपमहाद्वीप में इस सभ्यता के जितने स्थल खोजे जा चुके है उनमें से 80% स्थल सरस्वती नदी के किनारे, 17% सरस्वती व सिन्धु नदी को छोड़ अन्य नदियों के किनारे एवं 3% सिन्धु नदी के किनारे पाये गये हैं। भौगोलिकता की दृष्टि से सर्वाधिक उपयुक्त नाम सिंधु सरस्वती सभ्यता है। हालांकि यह नया नाम लोगों की जुबान पर उतना नहीं चढ़ पाया है। जितने की दोनों पुराने नाम।

निष्कर्ष: Conclusion

उपर्युक्त विवेचन से यह मानना अनुचित नहीं होगा कि इस सभ्यता का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता’ Indus civilization’ है, क्योंकि यह ज्ञात स्थलों में सर्वप्रथम तथा सर्वप्रमुख था।

3. हड़प्पा सभ्यता का उद्भव : Origin of harappan civilization

सिन्धु-सभ्यता का उदय सिन्धु नदी और उसकी सहायक नदियों की घाटियों में हुआ। यह सभ्यता पूर्ण विकसित नगरीय सभ्यता के रूप में प्रकाश में आयी।
आश्चर्य एवं खेद का विषय है कि इतनी विस्तृत सभ्यता होने के बावजूद भी इस सभ्यता के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में विद्वानों में भारी मतभेद हैं। अभी तक की खोजों से इस प्रश्न पर कोई भी प्रकाश नहीं पड़ सका है, कारण कि इस सभ्यता के अवशेष जहाँ कहीं भी मिले हैं अपनी पूर्ण विकसित अवस्था में ही मिले हैं।

सैन्धव सभ्यता के उद्भव को लेकर पुरातत्त्वविदों के मत दो वर्गों में विभाजित हैं । कतिपय विद्वान् सिन्धु सभ्यता के उदय में विदेशी तत्वों को सहयोगी मानते हैं, जबकि अन्य पुरातत्त्वविद् स्थानीय संस्कृतियों से ही नगरीय सभ्यता का विकास मानने के पक्ष में हैं। इस प्रकार सिन्धु सभ्यता के उदय में दो विचारधाराएँ दिखाई देती हैं :
(1) विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त,
(2) देशी (स्थानीय) उत्पत्ति का सिद्धान्त।

1. विदेशी उत्पत्ति का मत: Origin of harappan civilization

सर जॉन मार्शल, गार्डन चाइल्ड, सर मार्टीमर हीलर, क्रेमर, लियानार्ड वूली, एच.डी.संकालिया , डी.डी.कोशांबी आदि पुराविदों की मान्यता है कि सैन्धव सभ्यता की उत्पत्ति मेसोपोटामिया की सुमेरियन सभ्यता से हुई।
ह्वीलर समेत इन विद्वानों की धारणा है कि मेसोपोटामिया की सुमेरियन सभ्यता सिंधु की पूर्ववर्ती है।
विद्वानों ने सुमेरियन सभ्यता और सिन्धु सभ्यता में कतिपय समानताओं के आधार पर ही सिन्धु सभ्यता पर सुमेरियन सभ्यता का प्रभाव माना है।

इन दोनों सभ्यताओं में कुछ समान विशेषताएं देखने को मिलती हैं जो इस प्रकार हैं-
(1) दोनों नगरीय (Urban) सभ्यताएं हैं।
(2) दोनों के निवासी कांसे तथा ताँबे के साथ-साथ पाषाण के लघु उपकरणों प्रयोग करते थे।
 (3) दोनों के भवन कच्ची तथा पक्की ईटों से बनाये गये थे।
 (4) दोनों सभ्यताओं के लोग चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाते थे।
 (5) दोनों को लिपि का ज्ञान था।

विद्वानों का मानना है कि सभ्यता की प्रथम किरण मेसोपोटामिया में फूटी और वहीं से मिस्र होती हुई भारत पहुँची।  उपर्युक्त समानताओं के आधार पर हीलर ने सैन्धव सभ्यता को सुमेरियन सभ्यता का एक उपनिवेश (Colony) बताया है।

किन्तु गहराई से विचार करने पर यह मत तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है।

खंडन:-

विदेशी उत्पत्ति के उपरोक्त मत के विरोध में कतिपय पुरातत्वविदों की धारणा है कि यद्यपि सुमेरियन और सैन्धव सभ्यता में कुछ समानताएँ दृष्टिगोचर होती हैं, किन्तु दोनों सभ्यताओं में मुलभूत अन्तर भी हैं जिनकी हम उपेक्षा नहीं कर सकते।
ये निम्नवत हैं―
1. सिंधु तथा मेसोपोटामिया की सुमेरियन सभ्यता  भले ही दोनों नगरीय सभ्यता हों किन्तु सैंधव सभ्यता के नगरों का निर्माण सुमेरियन सभ्यता से अधिक बेहतर तथा योजनाबद्ध तरीके से किया गया है।
2. सुमेरियन सभ्यता की सड़कें अव्यवस्थित व टेढ़ी मेढ़ी हैं  वहीं दूसरी ओर सिंधु घाटी सभ्यता की सड़कें चौड़ी,सीधी, व समकोण पर काटती हुई प्राप्त हुई हैं।
3. हड़प्पा सभ्यता में सड़कों के किनारे नालियाँ, मैन होल आदि स्वच्छता के प्रतीक हैं। इसके विपरीत सुमेरियन सभ्यता में सफाई व्यवस्था का भी अभाव देखने को मिला है।
4. पुरातत्वविदों ने सुमेरियन सभ्यता के जिन उपकरणों मिट्टी के पात्रों, मूर्तियों और मुहरों आदि को सैन्धव सभ्यता से जोड़ने का प्रयास किया है उनमें भी पूर्ण समानता नहीं है। उल्लेखनीय है कि
 कि दोनों सभ्यता के मृद्भाण्डों, धातु के उपकरणों, मिट्टी और पत्थर की मूर्तियों आदि के आकार प्रकार और अलंकरण में अंतर है।
5.यह सही है कि दोनों ही सभ्यताओं में लिपि का प्रचलन था किंतु सैन्धव सभ्यताओं की लिपि में लगभग 537 चिह्न मिले हैं जबकि सुमेरियन सभ्यता के कीलाक्षर लिपि में 900 चिह्न हैं।
 
उपरोक्त तथ्यों के आधार पर सैन्धव सभ्यता पर सुमेरियन सभ्यता का प्रभाव मानना उचित नहीं प्रतीत होता है।
पुरातत्त्वविद् यह भी मानते हैं कि सुमेरियन सभ्यता के जो पुरावशेष सैन्धव सभ्यता के पुरास्थलों से प्राप्त हुए हैं अथवा सैन्धव सभ्यता की पुरानिधियाँ सुमेरियन सभ्यता के पुरास्थलों से मिली हैं, वे मात्र एक दूसरी सभ्यता के सांस्कृतिक और व्यापारिक सम्बन्ध के द्योतक हो सकती हैं। अत: सैन्धव सभ्यता सुमेरियन सभ्यता की ऋणी नहीं मानी जा सकती है।

देशी उत्पत्ति के मत:- Origin of harappan civilization

सैन्धव सभ्यता के विकास में स्थानीय संस्कृतियों का योगदान था, इस मत का प्रतिपादन स्टुअर्ट पिगट, अल्चिन दम्पति, फेयर सर्विस, जॉर्ज एफ० देल्स और रफीक मुगल आदि विद्वानों ने किया है।
इनके अनुसार हड़प्पा संस्कृति के आरंभ में जो ग्राम संस्कृतियां विकसित हुई थी वे ही हड़प्पा संस्कृतियों का मूल आधार है।
इनका मानना है कि सिंधु सभ्यता किसी विशिष्ट सभ्यता से अनुप्राणित न होकर स्थानीय संस्कृतियों से विकसित हुई।

इस क्षेत्र की प्रमुख प्राक सैंधव संस्कृतियों में जॉब संस्कृति , क्वेटा संस्कृति , कुल्ली संस्कृति , आमरी संस्कृति , सिंध तथा पंजाब की प्राक सैंधव संस्कृतियां , राजस्थान व हरियाणा की प्राक सैंधव संस्कृतियां आदि हैं।

            -:प्राक्-सैंधव संस्कृतियाँ:-

हड़प्पा, मोहनजोदड़ो तथा अन्य सैन्धव सभ्यता के पुरास्थलों के उत्खनन से प्राप्त नगरीय सभ्यता के पुरावशेष विकसित नगरों और कस्बों की ओर संकेत करते हैं।
पुरातत्वविदों की मान्यता है कि मानव इतिहास के अतीत में ऐसा काल भी था, जब नगरों का अस्तित्व नहीं था। मानव छोटे छोटे गाँवों और कस्बों में रहता था।

पुरातत्वविदों ने सिन्धु सभ्यता के विस्तार क्षेत्र का गहन अन्वेषण और सर्वेक्षण करके कतिपय ग्राम्य संस्कृतियों के अवशेष खोज निकाले हैं जिन्हें प्राक्-सैन्धव संस्कृति के नाम से जाना जाता इन प्राक-सैन्धव संस्कृतियों के अवशेष सिन्धु-सभ्यता के कुछ पुरास्थलों से भी नगरीय सभ्यता के निचले स्तर से प्राप्त हुए हैं। विद्वानों ने इन्हीं ग्राम्य संस्कृतियों को सिन्धु सभ्यता की जननी माना है।

विद्वानों के मत को चार वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है- बलुची, सोथी, द्रविड़ एवं आर्य । इसमें बलुची एवं सोथी पर विशेष जोर है।

कुछ प्राक् सैंधव संस्कृतियां व उनके विवरण निम्न हैं-

बलूची संस्कृति द्वारा उत्पत्ति संबंधी मत:-

बलूची संस्कृति के अंतर्गत चार ग्राम्य संस्कृतियां-कुल्ली संस्कृति, झोब/जॉब संस्कृति, आमरी नाल संस्कृति, क्वेटा संस्कृति आती हैं। ये पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में स्थित ग्राम्य संस्कृतियां थीं जिन्हें बलूची संस्कृति कहा जाता है।

1.जॉब संस्कृति:-

जॉब संस्कृति का विस्तार उत्तरी बलूचिस्तान में जॉब नदी घाटी क्षेत्र में मिलता है। इस संस्कृति के प्रमुख पुरास्थलों में राना घुंडई मुगल घुंडई, पेरिआनो घुंडई सूर जंगल, डाबरकोट और कौदानी आदि का उल्लेख किया जाता है । जॉब संस्कृति की पात्र-परम्परा लाल रंग की है, जिस पर काले रंग से चित्रण अभिप्राय बनाये गये हैं ।
राना धुंडई के उत्खनन का सूर्य ब्रिगेडियर रॉस के नेतृत्व में किया गया। इस उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों को स्टुअर्ट पिग्गॅट ने पाँच सांस्कृतिक कालों में विभाजित किया है। इस विभाजन का मुख्य आधार पात्रों के आकार प्रकार और चित्रण हैं। जॉब संस्कृति के 5 सांस्कृतिक कालों का विवरण निम्न है।

1. जॉब संस्कृति के प्रथम काल में सादे (अनलंकृत) पात्र मिले है, जिनका निर्माण हाथ से किया गया है। इस काल के अन्य पुरावशेषों में फ्लिण्ट के लघुपाषाण उपकरण, हड्डी की सुइयों, गधे और भेड़ की हड्डियाँ तथा खच्चर के चार दाँत उल्लेखनीय हैं।
2. इस संस्कृति के द्वितीय काल में लाल रंग के बर्तन मिले हैं, जिन पर काले रंग से चित्र बनाये गये हैं। इस काल के प्रमुख पात्र प्रकारों में कटोरे का उल्लेख किया जा सकता है। पुरातत्वविद् द्वितीय काल के पात्रों पर ईरानी प्रभाव मानते हैं। इस काल में मकान के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। मकानों की नींव में पत्थर का प्रयोग किया गया है।

3.जॉब संस्कृति का तृतीय काल अपेक्षाकत लम्बा था। इस काल के पात्र लाल सतह वाले हैं, जिन पर लाल रंग से चित्र अभिप्राय संजोये गये हैं। इस काल के प्रमुख पात्र प्रकारों में सुराही का उल्लेख किया जा सकता है। इस काल में आवास निर्माण के साक्ष्य मिले हैं, जिनका विकास तीन चरणों में दिखाई पड़ता है।
4. जॉब संस्कृति का चतुर्थ काल इस संस्कृति की विशिष्टताओं से भिन्न प्रतीत होता है। पुरातत्त्वविद् चतुर्थ काल का सम्बन्ध उत्तरकालीन हड़प्पा संस्कृति से जोड़ते हैं। इस काल के पात्र धूसर (भूरे) रंग के हैं, जो अपरिष्कृत हैं। इन पात्रों पर काले रंग से चित्र बनाये गये हैं । चित्रों में बेल-बूटेदार डिजाइन का प्रयोग किया गया है। इस काल के पात्र-प्रकारों में बड़े आकार के कटोरों का उल्लेख किया जाता है।

5. जॉब संस्कृति के पंचम काल का सम्बन्ध भी उत्तरकालीन हड़प्पा संस्कृति से माना जाता है। इस काल के पात्रों पर चित्रण अभिप्राय नहीं मिलते हैं। बर्तनों को उभरी हुई नक्काशी से सजाया गया है। पात्रों के अलंकरण के लिए कपड़े और गेहूँ की बाल के चित्रों का प्रयोग किया गया है।

जॉब संस्कृति के अन्य महत्वपूर्ण पुरावशेषों में नारी की मृण्मूर्तियाँ, (यद्यपि राना घुंडई पुरास्थल से नारी प्रतिमाएँ नहीं मिली हैं) पाषाण के लिंग एवं योनि, लघु पाषाण उपकरणों में बाणाग्र, सेलखड़ी के प्याले, हड्डी और पाषाण के मनके, हड्डी की चूड़ियाँ आदि उल्लेखनीय हैं। इनके अलावा विशेष पुरानिधियों में पेरिआनो धुंडई से प्राप्त ताम्र शलाका, पिन, डाबरकोट से प्राप्त ताँबे का खण्डित प्याला, सोने की पिन आदि की गणना की जा सकती है।

 जॉब संस्कृति के अनेक पुरास्थलों पर आनी गुंडई, मुगल गुंडई और सूर जंगल से शवाधान के साक्ष्य मिले हैं। इस संस्कृति में संगोरा शवाधान पद्धति अपनायी गयी है, जिसमें शव को जलाने के बाद हड्डियों को चुनकर पत्रों में रख दिया जाता था और पात्र को दफना दिया जाता था।

2.क्वेटा संस्कृति:-

इस संस्कृति में पाण्डु (गुलाबी- सफेद मिश्रित) रंग के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। इन पात्रों पर काले रंग से चित्र अभिप्राय संजोये गये हैं। पात्रों को अलंकृत करने के लिए ज्यामितीय रेखाओं का प्रयोग किया गया है।
क्वेटा संस्कृति की पात्र परम्परा चाक निमित है।
 प्रमुख पात्र प्रकारों में कटोरे, छिछली थालियाँ, जामदानी आदि का उल्लेख किया जा सकता है।
क्वेटा संस्कृति के प्रमुख पुरास्थलों में किले गुल मुहम्मद, दंब सादात, पिराक दंब और एडिय शहर की गणना की जाती है।
 इस संस्कृति के पात्र क्वेटा के आस-पास के क्षेत्रों के अलावा मिस बैट्रिस द का्दी को सिन्धु नदी के मैदान तक मिले हैं, किन्तु मिस कार्दी द्वारा खोजे गये मृद्भाण्डों की अपनी अलग विशेषता है।
 इसलिए इन्हें ‘टोगाऊ मृद्भाण्ड’ की संज्ञा प्रदान की जाती है, क्योंकि इन पात्रों को सर्वप्रथम टोगाऊ पुरास्थल से प्राप्त किया गया था।
 क्वेटा संस्कृति के विशिष्ट पुरावशेषों में ब्लेड, सेलखड़ी के प्याले, हड्डी के बेधक, मातृदेवी की मिट्टी की मूर्तियाँ आदि का उल्लेख किया जा सकता है।

3. आमरी-नाल संस्कृति:-

 आमरी-नाल संस्कृति के अवशेष दक्षिणी बलूचिस्तान से सिन्ध तक मिले हैं। इस संस्कृति की प्रमुख विशेषता पाण्ड (भूरे) रंग के मिट्टी के पात्र हैं। आमरी पुरास्थल की खोज एवं उत्खनन एन० जी० मजूमदार ने किया, किन्तु बाद में जे० एम० कजाल ने विस्तृत उत्खनन कराया, जिसके फलस्वरूप आमरी से पाँच सांस्कृतिक काल प्रकाश में आये।
इनमें से दो काल प्राक्-सैन्धव संस्कृति से सम्बन्धित है, शेष तीन सांस्कृतिक कालों का सम्बन्ध सैन्धव सभ्यता, झूकर संस्कृति एवं झांगर संस्कृति से है । वस्तुत: आमरी से मिले चार सांस्कृतिक काल ही आद्यैतिहासिक माने जाते हैं। आमरी संस्कृति के प्रथम काल को मृद्भाण्डों के आकार-प्रकार और अलंकार अभिप्राय के आधार पर चार कालों में विभाजित कर दिया गया है।
Hadappa sabhyta images

पाण्डु रंग के मृद्भाण्डीय संस्कृति में आमरी के अतिरिक्त नाल पुरास्थल की भी गणना की जाती है। नाल पुरास्थल पश्चिमी बलूचिस्तान के कलात जिले में स्थित है। इस पुरास्थल का उत्खनन एच० हरग्रीब्स ने कराया था। उन्होंने नाल के समाधि क्षेत्र को उत्खनन के लिए चुना। नाल के उत्खनन से प्राप्त मृद्भाण्ड पाण्डु (भूरे) अथवा गुलाबी रंग के हैं।
नाल के मृद्भाण्डों पर विभिन्न प्रकार के अलंकार अभिप्राय मिले हैं।

इस पुरास्थल के प्रमुख पात्र प्रकारों में कटोरे, चित्रित बेलनाकार पेटिका और पेंदीदार मिट्टी के बर्तनों की गणना की जा सकती है। नाल से प्राप्त विशेष पुरावशेषों में विभिन्न प्रकार के पत्थरों के मनके, ताँबे की ठप्पा वाली मुहर, ताम्र उपकरण, आदि हैं।

4. कुल्ली संस्कृति:-

कुल्ली संस्कृति का प्रमुख पुरास्थल कुल्ली है, जो बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में कोलवा जिले में स्थित है। इस पुरास्थल की खोज आरेल स्टाइन ने की थी। इस संस्कृति का एक प्रमुख पुरास्थल मेही भी है। कुल्ली संस्कृति में दो प्रकार की पात्र परम्पराएँ मिली हैं। प्रथम प्रकार की पात्र परम्परा विशुद्ध कुल्ली संस्कृति की है, जबकि द्वितीय प्रकार की पात्र परम्परा में सिन्धु सभ्यता के पात्र-प्रकारों के साथ दिल्ली पात्र परम्परा मिली है। इस संस्कृति के अधिकांश पात्र अलंकृत हैं, लेकिन कुछ सादे पात्र भी मिले हैं।
कुल्ली संस्कृति के प्रमुख पात्र-प्रकारों में साधार तश्तरियाँ, छिछली थालियाँ, खड़ी बारी के कटोरे, बोतल के आकार के पात्र, जामदानी आदि उल्लेखनीय हैं। पुरातत्त्वविद साधार तश्तरियों और बेलनाकार छिद्रयुक्त पात्रों पर सैन्धव सभ्यता का प्रभाव मानते हैं । कुल्ली संस्कृति के अन्य पुरावशेषों में सिल-लोढ़ा, ब्लेड, मिट्टी की चूड़ियाँ, ताम्र-दर्पण (सिर रहित नारी के आकार वाले मूठ से युक्त) आदि की गणना की जा सकती है। इस संस्कृति में मिट्टी की नारी मूर्तियाँ भी मिली हैं। इन नारी मूर्तियों को धड़ के नीचे चिपटा बनाया गया है और इनके हाथ केहुनी से मुड़े हैं ।
विद्वानों के अनुसार मिट्टी की नारी मूर्तियों का सम्भवत: धार्मिक महत्त्व रहा होगा। मूर्तियों में ककुदमान सांड की मूर्ति भी उल्लेखनीय है।

Sindhu ghati sabhyta

कुल्ली संस्कृति के लोग अपने पूर्वजों की अन्त्येष्टि भी करते थे। कुल्ली पुरास्थल से मृतकों के दाह-संस्कार के साक्ष्य मिले हैं, जबकि मेही में अस्थियों को कलशों में भर कर दफनाया गया है। मेही के उत्खनन में शवाधान के साथ अन्त्येष्टि सामग्री रखी गयी है। मेही के एक कब से ताँबे का दर्पण, मिट्टी के पात्र, मिट्टी की मूर्तियाँ और ताँबे की दो पिने अन्त्येष्टि सामग्री के रूप में मिली हैं।

सोथी संस्कृति से उत्पत्ति संबंधी मत:

राजस्थान में बीकानेर जिले के सोथी नामक स्थल पर सोथी नामक संस्कृति का आविर्भाव हुआ है. इस स्थल पर प्राक् हड़प्पाकालीन मृद्भाण्ड अवशेष खुदाई के दौरान प्राप्त हुए हैं. ऑल्चिन, अग्रवाल, अमलानन्द घोष इस संस्कृति को सिंधु सभ्यता की आरम्भिक सभ्यता मानते हैं।
प्रसिद्ध विद्वान अमलानंद घोष , अल्चीन दम्पति (रेमण्ड अल्चीन व बिजेट अल्चीन) , धर्मपाल अग्रवाल आदि विद्वानों का मानना ​​है कि राजस्थान के बीकानेर व गंगानगर जिले की सोथी संस्कृति से ही हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति हुई है।
राजस्थान के क्षेत्रों से प्रायः अनेक पूर्व हड़प्पा कालीन मृदभांड प्राप्त हुए हैं।
अमलानंद घोष ने 1953 ई. में राजस्थान के बीकानेर व गंगानगर जिले के आस पास के क्षेत्रों से तथा कालांतर में लुप्त प्राय सरस्वती नदियों की घाटियों में तथा अन्य उत्तरी राजस्थान के क्षेत्रों में सोथी संस्कृति का पता लगाया।
चूंकि बाद में/कालांतर में सोथी संस्कृति प्रकार के मृद्भाण्ड कालीबंगा(गंगानगर जिला, राजस्थान) से भी प्राप्त हुए हैं अतः कुछ विद्वान इस संस्कृति को ‘सोथी संस्कृति’ तथा कुछ विद्वान इसे ‘कालीबंगा प्रथम’ संस्कृति का नाम देते हैं।
अमलानंद घोष सोथी (कालीबंगा प्रथम) संस्कृति के साक्ष्यों की सिंधु सभ्यता से समानता देखते हैं। इन साक्ष्यों में प्रमुख हैं-मत्स्य-शल्क, पीपल की पत्ती का अंकन, रस्सी के निशान का अंकन, साधारण तस्तरी, उथले नांद और बर्तनों के छल्लेदार आधार–आदि।
 डी. पी. अग्रवाल और आल्चिन भी यह मानते हैं कि सोधी संस्कृति सिंधु सभ्यता से पूर्व की अलग संस्कृति नहीं थी बल्कि वह सिंधु सभ्यता का प्रारम्भिक रूप थी। डी. पी. अग्रवाल के मुताबिक सिंधु सभ्यता, ग्रामीण सोथी संस्कृति का ही नागरिक रूप है और यह ग्रामीण स्वरूप कुछ समय तक उसके नागरिक रूप के साथ-साथ बना रहा।
लेकिन अमलानंद घोष यह मानते हैं कि सोथी से ही हड़प्पा सभ्यता का विकास हुआ। घोष का कहना है कि यह मानना कि बाहर से लोगों ने सैंधव क्षेत्र में आकर नगर या उपनिवेश बसाए, उत्तना तार्किक नहीं लगता जितना की यह मानना कि इन संस्कृतियों के लोगों ने, जिनका मस्तिष्क अधिक ग्रहणशील था, मेसोपोटामिया से नागरिक जीवन की कला को ग्रहण कर मेसोपोटामिया से अधिक योजनाबद्ध, बेहतर एवं सुव्यवस्थित नगरों का निर्माण किया।

द्रविड़ संस्कृति से उत्पत्ति संबंधी मत:

सैंधव सभ्यता की खुदाई से भिन्न-भिन्न जातियों के अस्थिपंजर प्राप्त होते हैं। इनमें प्रोटो-आस्ट्रलायड (काकेशियन), भूमध्यसागरीय, मंगोलिया तथा अल्पाइन-इन चार जातियों के अस्थिपंजर हैं। मोहनजोदड़ो के निवासी अधिकांशतः भूमध्य-सागरीय थे। अधिकांश विद्वानों की धारणा है कि सिंधु सभ्यता के निर्माता द्रविड़ भाषी लोग थे।
राखालदास बैनर्जी का मत है कि हड़प्पा संस्कृति के जनक द्रविड़ लोग जाति के लोग थे।
इस मत का समर्थन हेरास, हाल आदि विद्वानों ने भी किया है।
बलूचिस्तान में बसने वाली ब्राहुई जाति की भाषा द्रविड़ है। कदाचित् इस प्रदेश में रहने वाले सिन्धु-निवासियों की भाषा से ही उसकी उत्पत्ति हुई होगी पुनः दक्षिणी भारतवर्ष के द्रविड़ प्रदेश में प्राप्त पात्र, भाण्ड एवं आभूषण सिन्धु वासियों की कृतियों के समान लगते हैं। उन पर अंकित चिन्ह सिन्धु-लिपि के समान लगते हैं। अभाग्यवश अभी तक सिन्धु-लिपि.पढ़ी नहीं जा सकी है, अन्यथा सिन्धु-निवासियों के जाति-निर्धारण में हमें बड़ी सुगमता हो जाती।
सुनीति कुमार चटर्जी ने भाषाविज्ञान के आधार पर यह सिद्ध किया है कि ऋग्वेद में जिन दास-दस्युओं का उल्लेख हुआ है वे द्रविड़ भाषी थे और उन्हे ही सिन्धु सभ्यता के निर्माण का श्रेय दिया जाना चाहिये। किन्तु यह निष्कर्ष भी संदिग्ध है।
इसके विपरीत पुराविद् लक्ष्मण स्वरूप वत्स आर्यों को सिंधु व वैदिक दोनों सभ्यताओं के जन्मदाता मानते हैं।
यदि द्रविड़ सैन्धव सभ्यता के निर्माता होते तो इस सभ्यता का कोई अवशेष द्रविड़ क्षेत्र से अवश्य मिलता। सैन्धव सभ्यता के विस्तार वाले भाग से ब्राहुई भाषा के साक्ष्य नहीं मिलते। बलूचिस्तान की ब्राहुई भाषा को द्रविड़ भाषा के साथ संबद्ध करने का कोई पुष्ट आधार नहीं है।

आर्य संस्कृति द्वारा उत्पति संबंधी मत:-

प्रो0 टी0 एन0 रामचन्द्रन, के0 एन0 शास्त्री, पुसालकर, एस0 आर राव आदि विद्वान् वैदिक आर्यों को ही इस सभ्यता का निर्माता मानते हैं।
उल्लेखनीय है कि लोथल, कालीबंगा आदि कुछ सैन्धव स्थलों से यज्ञीय वेदियां प्राप्त होती हैं। इसी प्रकार मोहनजोदड़ो से मिट्टी की बनी घोड़े की आकृति, लोथल से घोड़े की तीन मृण्मूर्तियां तथा सुरकोटड़ा से घोड़े की हड्डियाँ प्राप्त हो चुकी हैं। लोथल के घोड़े का दायां ऊपरी चौधरी (Upper molar) भी मिलता है जिसके दांत बिल्कुल आधुनिक अश्व के दांत जैसे ही हैं। समुद्री यात्रा, जलयान आदि से संबंधित विवरण यह सिद्ध करते है कि इस सभ्यता में नगरीय तत्व पर्याप्त मात्रा में विद्यमान थे।
वैदिक साहित्य में जो भौतिक सभ्यता मिलती है वही सिन्धु में भी है।
 परन्तु अनेक विद्वान् इसे स्वीकार नहीं करते क्योंकि उनके अनुसार दोनों ही सभ्यताओं के रीति-रिवाजों, धार्मिक तथा आर्थिक परम्पराओं में पर्याप्त विभिन्नतायें दिखाई देती हैं। सैन्धव तथा वैदिक सभ्यताओं के मुख्य अन्तर इस प्रकार हैं
(1) वैदिक आर्यों की सभ्यता ग्रामीण एवं कृषि प्रधान की जबकि सैंधव सभ्यता नगरीय तथा व्यापार-व्यवसाय प्रधान थी। आर्यों के मकान घास-फूस तथा बांस की सहायता से बनते थे किन्तु सैन्धव लोग इसके लिये पक्की ईंटों का प्रयोग करते थे।
 (2) सिंधु सभ्यता के निर्माता पाषाण तथा कांसे के उपकरणों का प्रयोग करते थे और लोहे से परिचित नहीं थे। इसके विपरीत वैदिक आर्यों को लोहे का ज्ञान था।
(3) वैदिक आर्य इन्द्र, वरुण आदि देवताओं के उपासक थे, वे यज्ञ करते थे तथा लिङ्ग-पूजा और मूर्ति-पूजा के विरोधी थे परन्तु सैंधव लोग मुख्य रुप से माता देवी तथा शिव के पूजक थे, लिङ्गों की पूजा करते थे तथा मूर्ति-पूजा के समर्थक थे।
(4) आर्यों का प्रिय पशु अश्व था जिसकी सहायता से वे युद्धों में विजय प्राप्त करते थे। किन्तु सैंधव लोग अश्व से परिचित नहीं थे। सिन्धु सभ्यता के लोग व्याघ्र तथा हाथी से भी परिचित थे क्योंकि उनकी मुद्राओं पर इन पशुओं का अंकन हुआ है। इसके विपरीत वैदिक आर्यों को इनका ज्ञान नहीं थी।
(5) आर्यों के धार्मिक जीवन में गाय की महत्ता थी। इसे ‘अघ्न्या’ कहा गया है। इसके विपरीत सैधव लोग वृषभ को पवित्र एवं पूज्य मानते थे।
(6) सैन्धव निवासियों के पास अपनी एक लिपि थी, जबकि आर्य लिपि से परिचित नहीं लगते। उनकी शिक्षा प्रणाली मौखिक थी।
यह प्रस्तावना नितान्त तथ्यहीन है कि सिन्धु सभ्यता नागर एवं साक्षर थी तथा वैदिक सभ्यता ग्रामीण, पशुचारी एवं निरक्षर।
 डॉ. जी. सी. पाण्डे ने हाल ही में प्रकाशित अपने ग्रन्थ वैदिक संस्कृति में इस बात का उल्लेख किया है कि ऋक्संहिता में कम से कम 85 बार ‘पुर’ का उल्लेख हुआ है जबकि ग्राम मात्र नौ बार तथा ‘ग्राम्य’ एक बार आता है। “न तो हड़प्पा सभ्यता मात्र नागरिक थी, न वैदिक सभ्यता मात्र पशुपालक-यायावरीय। दोनों ही सभ्यतायें देश-काल में विस्तार और प्राविधिक विकास की दृष्टि से समान हैं। स्थूल रूप से उन्हें एक ही विशाल सभ्यता के विविध पक्ष, प्रदेश या अवस्थायें देखी जा सकती हैं।”
 वेदों में लेखन परम्परा के अभाव का कारण यह नहीं है कि आर्य लिपि से अपरिचित थे।
इतना विस्तृत गद्य, व्याकरण, मानक भाषा, बिना लिपि के संभव नहीं है। वेद रचना निरक्षर समाज में नहीं हुई। लिपि के अभाव का कारण यह है कि रहस्यात्मक परमज्ञान के लिये लेखन उपयोगी न होकर बाधक माना गया है जहाँ तक मूर्ति पूजा, लिंग पूजा, योनि पूजा आदि का सम्बन्ध है, हड़प्पा सभ्यता में इनका प्रचलन भी संदिग्ध रूप से नहीं सिद्ध किया जा सकता।

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सिंधु सभ्यता की जाति:-

अभी तक यह निश्चित रूप से नही कहा जा सकता कि सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता / जन्मदाता किस जाति के थे । उनकी जाति के विषय मे अनेक मत प्रतिपादित किये गए हैं किंतु खेद की बात है कि अभी तक कोई ऐसा मत सामने नही आया है जिसमे कोई खंडन न विद्यमान हो।
कुछ विद्वान सिंधु सभ्यता के जन्मदाता को आर्यों से संबंधित करते हैं।

सैंधव सभ्यता तथा वैदिक सभ्यता:-

प्रो0 टी0 एन0 रामचन्द्रन, के0 एन0 शास्त्री, पुसाल्कर, एस0 आरO राव आहे विद्वान वैदिक आर्यों को ही इस सभ्यता का निर्माता मानते हैं। परन्तु अनेक विद्वान स्वीकार नहीं करते क्योंकि उनके अनुसार दोनों ही सभ्यताओं के रीति-रिवाजों धार्मिक तथा आर्थिक परम्पराओं में पर्याप्त विभिन्नतायें दिखाई देती हैं। सैन्धव तक वैदिक सभ्यताओं के मुख्य अन्तर इस प्रकार हैं―
(1) वैदिक आर्यों की सभ्यता ग्रामीण एवं कृषि प्रधान थी जबकि सैंधव सभ्यता नगरीय तथा व्यापार-व्यवसाय प्रधान थी। आर्यों के मकान घास-फूस तथा बांस की सहायता से बनते थे किन्तु सैन्धव लोग इसके लिये पक्की ईंटों क प्रयोग करते थे।
 (2) सिंधु सभ्यता के निर्माता पाषाण तथा काँसे के उपकरणों का प्रयोग करते थे और लोहे से परिचित नहीं थे। इसके विपरीत वैदिक आर्यों को लोहे का ज्ञान
था।
(3) वैदिक आर्य इन्द्र, वरुण आदि देवताओं के उपासक थे, वे यज्ञ करते थे तथा लिङ्ग-पूजा और मूर्ति-पूजा के विरोधी थे। परन्तु सैंधव लोग मुख्य रुप से माता देवी तथा शिव के पूजक थे, लिङ्गों की पूजा करते थे तथा मूर्ति-पूजा के समर्थक थे।
 (4) आर्यों का प्रिय पशु अश्व था जिसकी सहायता से वे यद्धों में विजय प्राप्त करते थे। किन्तु सैंधव लोग अश्व से परिचित नहीं थे। सिन्धु सभ्यता के लोग व्याघ्र तथा हांथी से भी परिचित थे क्योंकि उनकी मुद्राओं पर इन पशुआ का अंकन हुआ है। इसके विपरीत वैदिक आर्यों को इसका ज्ञान नहीं थी।
(5) आर्यों के धार्मिक जीवन में गाय की महत्ता थी। इसे ‘अध्न्या’ कहा गया इसके विपरीत सैधव लोग वृषभ को पवित्र एवं पूज्य मानते थे। है।
 (6) सैन्धव निवासियों के पास अपनी एक लिपि थी जबकि आर्य लिपि स परिचित नहीं लगते। उनकी शिक्षा प्रणाली मौखिक थी।
इस प्रकार उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि सिंधु सभ्यता के निर्माता वैदिक आर्य नही थे ।
किन्तु उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हम कह सकते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता किसी विदेशी सभ्यता द्वारा उत्पन्न होने की मोहताज न थी अपितु वह मूलतः देशी सभ्यता थी।
धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलाहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय
 
 

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