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27 February 2021

पुरापाषाण काल (Paleolithic Age) , मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age) , नवपाषाण काल(Neolithic Age) की सम्पूर्ण जानकारी in hindi for Upsc

 

इस लेख को अंत तक पूरा पढ़ें क्योंकि यह UPSC व अन्य राज्यों की State PCS समेत अन्य एक दिवसीय व बहु दिवसीय परीक्षाओं के लिए उपयोगी है। 


भारतीय इतिहास (Indian history in hindi):–

संपूर्ण भारत का गरिमामयी भारतीय इतिहास (Indian history) को साधारणतया तीनों भागों में विभाजित किया जाता है। 


1. पूर्वैतिहासिक काल (Pre-historic Age)―


यह भारतीय इतिहास (Indian history) का एक ऐसा काल है जिसमें लेखन-कला न थी। अतः लिखित साक्ष्यों के अभाव में इसका ज्ञान हमें पाषाण के उपकरणों, मिट्टी के बर्तनों, खिलौनों आदि से होता है। उदा०- पाषाण काल


(2) आद्य ऐतिहासिक काल (Proto-historic Age)―


 इस काल में लेखनकला का जन्म हो चुका था। परन्तु अभाग्यवश इसके लेख पढ़े नहीं जा सके हैं या फिर उनकी गूढ़ लिपि का अर्थ निकलना कठिन हो। उदा०- सिन्धु सभ्यता , वैदिक सभ्यता


(3) ऐतिहासिक काल (Historic Age) -


 यह वह काल है जिसमे लिखित साक्ष्य उपलब्ध होता है। उदाहरण- महाजनपद काल (छठी शताब्दी ई०पू०) से अब तक


To the point जानने के लिए देखें 👇

● सम्पूर्ण पाषाण काल (संक्षेप में पूर्ण जानकारी)


अब आते हैं इस लेख के मुख्य बिंदु पर ―

पाषाण काल (Lithic Age in hindi):- 

पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल, नवपाषाण काल


मानव के प्रारंभिक काल के विषय में जो पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं, उनमें पाषाण/प्रस्तर (पत्थर/Stone) से बने उपकरणों की अधिकता है, इसी कारण इसे पाषाण काल (Lithic Age) कहा जाता है।

 लिथिक (Lithic) शब्द यूनानी भाषा के लिथोस (Lithos) से बना है जिसका अर्थ होता है- पाषाण या प्रस्तर (Stone)। 


भारत में पाषाण काल आदि काल से (लगभग 30,00,000 ई०पू० से) 1000 ई०पू० तक माना जाता है। 

【1000 ई०पू० इसलिए माना जाता है क्योंकि ताम्रपाषाण काल  3500-1000 ई०पू० तक माना जाता है】 

पाषाण काल (Lithic Age) : 


पाषाणकालीन मनुष्य के क्रमिक विकास को परिलक्षित करने के लिए 1863 ईसवी में ल्यूक (Lubbock) महोदय ने पाषाण-काल को दो भागों में विभाजित किया गया था - 

(1) Palaeolithic Age (पूर्व पाषाण-काल) और 

(2) Neolithic Age (उत्तर पाषाण-काल) 


 यूनानी भाषा में Palaios और Neo क्रमशः 'प्राचीन' और 'नवीन' के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं , और Lithos 'पाषाण' के अर्थ में।

           प्रारम्भ में विद्वानों का मत था कि दोनों काल एक-दूसरे से नितान्त पृथक् हैं, उनके बीच में कोई भी कड़ी नहीं है। वे एक दूसरे से असम्बद्ध है, परन्तु कालान्तर में विद्वानों के अन्वेषणों ने इस धारणा को असत्य सिद्ध कर दिया। 

उन्होंने दोनों के बीच Mesolithic Age (मध्य पाषाण-काल) का पता लगाया है। यह शब्द भी यूनानी Mesos ( मध्य ) से निर्मित हुआ है।

 विद्वानों का मत है कि मध्य पाषाण-काल, पूर्व पाषाण-काल और उत्तर पाषाण-काल के बीच में एक कड़ी है जो पाषाणकालीन सभ्यता के क्रमिक, सुसम्बद्ध और अविच्छिन्न विकास की सूचना देती है। इस मध्य पाषाण-काल को वास्तव में संक्रान्ति-काल समझना चाहिए। इसमें न तो पूर्व विशेषताओं को पूर्णतया परित्याग दिखाई देता है और न नवीन विशेषताओं का पूर्णतया ग्रहण ही। 

नव पाषाण काल के अंतिम समय आते आते मानवों ने ताम्र  धातु की खोज कर ताम्र उपकरणों का प्रयोग शुरू कर दिया था। किन्तु इस समय तक भी मनुष्यों ने पाषाण उपकरणों का प्रयोग ताम्र उपकरणों के साथ साथ लगातार किया था। इस लिए इस काल को ताम्रपाषाण काल कहा जाता है। 


इसके अतिरिक्त दक्षिण भारत में 1000 ई०पू० के आस पास एक संस्कृति का उद्भव हुआ इसे महापाषाणिक संस्कृति का नाम दिया गया। इसमें बड़े बड़े पत्थरों से समाधि या कब्रो का निर्माण किया जाता था। 


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● ऐतिहासिक स्रोत(साहित्यिक स्रोत)

ऐतिहासिक स्रोत(पुरातत्व)

ऐतिहासिक स्रोत (विदेशी विवरण)

● हड़प्पा सभ्यता: एक दृष्टि में


इस प्रकार अब पाषाण काल को निम्न भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है- 


1. पुरापाषाण काल (Paleolithic Age)

2. मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age)

3. नवपाषाण काल (Neolithic age) 

4. ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic age)

5. महापाषाण काल (Megalithic Age)


आईये उपरोक्त को संक्षेप में समझते हैं― 

1. पुरापाषाण काल (Paleolithic age)―


मनुष्य ने अपने जीवन का सबसे लंबा समय इसी युग के अंतर्गत व्यतीत किया है इसी समय प्रकृति से संघर्ष कर उसने जीने की कला सीखी। इस समस्त युग को क्रमशः निम्न (lower), मध्य (middle) तथा उच्च (upper) पुरापाषाण काल में विभक्त किया गया है।


पुरापाषाण काल की प्रमुख विशेषताएं / पुरापाषाण कालीन मानव जीवन कैसा था? 


■  ~ इस काल के मानव मुख्यतः आखेट (शिकार) पर निर्भर हुआ करते थे। तथा उनका मुख्य भोजन कच्चा मांस और कंदमूल फल हुआ करता था। 


~ इस काल में मानव आग की खोज कर लिया था किंतु इसके प्रयोग से अनभिज्ञ था। 

~ इस समय के मानव का निश्चित निवास स्थान नहीं था तथा उनका जीवन खानाबदोश अथवा घुमक्कड़ था। 

~ इस काल में मानव का मुख्य कार्य शिकार और खाद्य संग्रहण था, खाद्य उत्पादन नहीं। 

~ अब तक मानव पशुपालन, कृषि कर्म, बर्तन निर्माण, अंत्येष्टि संस्कार से पूर्णतः अनभिज्ञ था। 


पुरापाषाण काल को कितने भागों में बांटा गया है? 

पाषाण उपकरणों में भिन्नता के आधार पर पुरापाषाण काल को निम्न तीन भागों में विभाजित किया जाता है-


i. पूर्व / निम्न-पुरापाषाण काल, (Lower Paleolithic age) - 6 लाख से 1.5 लाख ई०पू० के बीच का समय

ii मध्य-पुरापाषाण काल (Middle Paleolithic age) - 1.5 ई०पू० से 35,000 ई०पू० के मध्य का काल

iii. उत्तर-पुरापाषाण काल या उच्च पुरापाषाण काल (Upper Paleolithic age) - 35,000 ई०पू० से 10,000 ई०पू० के मध्य का काल


निम्न पुरापाषाण काल :- 


~ इस काल का अधिकांश भाग हिमयुग के अंतर्गत व्यतीत हुआ। इसमें मानव जीव का विकास हुआ तथा उसका जीवन पूर्णतः अस्थिर था। 

~ अस्थिर का तात्पर्य उसके भोजन, आवास, वस्त्र की व्यवस्था नहीं थी। 

~ कालांतर में भोजन के लिए मानवों ने आखेट को आधार बनाया जिससे उसे हथियारों की आवश्यकता पड़ी। (इस समय के हथियार बेडौल व बड़े बड़े थे)

~ इस काल औजार चकमक पत्थर/स्फटिक (Quartzite) के बने थे।

~ प्रमुख औजार― Chopper(गंडासा) , Chopping(खंडक) , Hand Axe (हस्तकुठार)।

इसमें chopper-chopping के प्रथम अवशेष सोहन नदी घाटी (पाकिस्तान) तथा Hand axe के प्रथम अवशेष पल्लवरम, मदुरै, अतिरम्पक्कम से प्राप्त हुए हैं। 


निम्न पुरापाषाण काल के पुरास्थल:- बेलन घाटी(मिर्ज़ापुर, उ०प्र०), नर्मदा घाटी, भीमबेटका, सोन घाटी (म०प्र०) चिरकी नेवासा(महाराष्ट्र), नागार्जुनकोंडा(आन्ध्र प्रदेश) , पल्लवरम, अतिरम्पक्कम (तमिलनाडु) आदि।

मध्य-पुरापाषाण काल (Middle Paleolithic Age):- 


~ इस काल मे मानव अपने उपकरणों को अधिक सुंदर एवं उपयोगी बनाया। जो कि पहले की अपेक्षा सुडौल,छोटे,पैने और उपयोगी थे। 

~ इस युग में क्वार्टजाइट की जगह चर्ट, जैस्पर, फ्लिंट जैसे पत्थरों का उपयोग करके फलक हथियार ही बनाये गए , इसी लिए इस संस्कृति को डॉ० H. D. संकलिया ने इसे फलक संस्कृति कहा। 

~ प्रमुख उपकरण― बेधक (Borers) , खुरचनी (Scraper), तक्षणी (Burin) आदि। यदा कदा हाथ की कुल्हाड़ियाँ (Hand axe) भी। 

~ अब भी मानव भोजन संग्राहक ही था किन्तु अब वह गुफाओं आदि कंदराओं में रहने लगा था। साक्ष्य: भीमबेटका की गुफाएं।

मध्य-पुरापाषाण काल के पुरास्थल:- बेलन घाटी (उ०प्र०), सोहन घाटी (पंजाब, पाकिस्तान), भीमबेटका (रायसेन, म०प्र०), नेवासा(महाराष्ट्र), अतिरम्पक्कम(तमिलनाडु), सौराष्ट्र, कच्छ(गुजरात) आदि।


उच्च पुरापाषाणकाल (Upper paleolithic age)― 

~ यह हिमयुग का अंतिम चरण का काल था। जिसमे होमोसेपियंस का उदय हुआ। 

~ इस समय पत्थर के ब्लेडों से उपकरण बनाये जाने लगे। (औजार बनाने में दक्षता)

~ प्रमुख औजार― ब्लेडों से चाकू, ब्यूरिन(Burin), छिद्रक(Borer), स्क्रेपर (Screpper) और शर(Points) आदि।

~ पत्थरों के अतिरिक्त इस युग में हड्डी , सींगो व हाथी दांत के उपकरण भी बनाये जाने लगे।

~ अस्थि के औजार/उपकरण- अलंकृत छड़, भाले की नोंक, सुइयाँ इत्यादि।

~ प्रमुख पुरास्थल― बेलन घाटी(उ०प्र०) , रेनिगुटा, येर्रगोंडपलेम, मुच्छलता, चिन्तामनुगावी, बेटमचेर्ला (आँ०प्र०) , शोरापुर दोआब, बीजापुर (कर्नाटक) , पटने, इनामगांव (महाराष्ट्र) , सोन घाटी (म० प्र०) , विसादी (गुजरात) , सिंहभूमि (बिहार) इत्यादि। 


उच्च पुरापाषाण की विशेषताएं:-


• अब भी मानव की जीविका का मुख्य आधार शिकार ही था किंतु सामुदायिक जीवन की ओर मनुष्य अग्रसर हो चुका था। 

• अनेक व्यक्ति झुण्डों व कुलों में रहने लगे थे जिनसे आगे परिवार की उत्पत्ति हुई। 

• पुरुष भोजन संग्रहण करता तथा महिलाएं घर के काम 

• अब मानव गुफाओं के अलावा झोपड़ियों में भी रहने लगा था। 

• हड्डी की सुइयों से अब मानव चमड़े आदि के वस्त्र भी सम्भवतः बनने लगे थे।

• कला व धर्म की ओर भी लोगों में रुचि उद्भूत हो चुकी थी। उदा०- भीमबेटका की गुफाओं के चित्र।


इतनी प्रगति के बाद भी मानव अभी सभ्य नहीं बना था। वह असभ्य, बर्बर और जंगली ही था। 

सभ्यता की सीढ़ी की ओर आगे बढ़ते हुए मानव अब मध्यपाषाण काल मे प्रवेश कर रहा था। 

         मध्य पाषाणकाल (Mesolithic age) :- 


यह काल हिमयुग की समाप्ति का समय था जोकि नवपाषाण काल (Neolithic age) का अग्रगामी काल था। इस युग मे वैसे तत्वों का विकास हुआ जिन्होंने नवपाषाण युग में मानव के सामाजिक, आर्थिक जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला दिया―(जलवायवीय परिवर्तन)

~ इसमें बर्फ की जगह घर से परे मैदान एवं जंगल उगने आरंभ हो गए, पुराने मौसमी जलस्रोत सूख गए, दलदली भूमि का स्थान जंगलों व घास के मैदानों ने ले लिया, नए प्रकार की वनस्पति एवं जानवरों का प्रादुर्भाव हुआ। 

~ ठण्ड में रहने वाले विशालकाय जानवरों (मैमथ, रेनडियर आदि) की जगह घास खाने वाले छोटे जानवरों (खरगोश, हिरन, बकरी, आदि पैदा हुए। 

~ चूंकि जानवर छोटे हो रहे थे तो उनके आखेट के लिए छोटे हथियारों की आवश्यकता पड़ी। 

~ अतः मानव ने इस काल में लघु पाषाण उपकरण (Microliths) बनाना आरंभ कर दिया। इनको इस्तेमाल के लिए इन्हें लकड़ी के अथवा हड्डी के हत्थों में नियत(Fix) किया जाता था। 

~ इसी समय मनुष्यों ने प्रक्षेपास्त्र तकनीक (तीर-धनुष) का भी विकास किया। 

~ प्रमुख उपकरण:- इस युग में कुछ उच्च पुरापाषाण कालीन औजार परिष्कृत व छोटे कर के इस्तेमाल में लाए गए। इनमें खुरचनी(Scraper), तक्षणी(Burin), बेधक(Borer) , बेधनी(Point) आदि प्रमुख थे। 

~ इस युग के प्रमुख लघुपषाण उपकरण(Microliths):- इकधार फलक(Baked blade), बेधनी(Points), चान्द्रिक(Lunates), समलंब चतुर्भुज (Trapezes)  आदि।

~ मध्यपाषाण काल के प्रमुख पुरास्थल:- वीरभानपुर (प०बंगाल), लंघनाज (गुजरात) , टेरी समूह (तमिलनाडु) , आदमगढ़ (म०प्र०) , बागोर (राजस्थान) , मोरहना पहाड़, सराय नाहर रॉय, महदहा , दमदमा, चोपनीमांडो, लेखहिया, बघहीखोर (उ०प्र०) इत्यादि। 


मध्यपाषाण काल की प्रमुख विशेषताएं-


• अब मानव जनसंख्या वृद्धि और आखेट की सुविधा के लिए छोटी छोटी टोलियों में रहना लगा था। 

• स्थायी निवास, पशुपालन व कृषि की शुरुआत हुई व मिट्टी के बर्तन/मृद्भाण्ड भी बनने लगे थे। 

• साक्ष्य:- 

बागोर, सरायनाहर राय- सुनियोजित शवाधान 

चोपनीमांडो, सरायनाहर, महदहा आदि- स्थायी झोपड़ियां

आदमगढ़, भीमबेटका― शिलाचित्र 


इस प्रकार इस काल तक पशुपालन, आरंभिक कृषि, व स्थायी निवास बनाया जाने लगा था। अब मानव इन समस्त कलाओं के साथ नवपाषाण काल मे प्रवेश हुआ। 


नवपाषाण काल (Neolithic Age):- 


यह प्रागैतिहासिक काल मे मानवों के विकास की सबसे प्रमुख सीढ़ी है जिसमें सर्वाधिक क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। 

~ अब मानव सुचारू रूप से कृषि करने लगा था (अर्थात भोजन संग्राहक से भोजन उत्पादक बना), पशुपालन और स्थायी निवास या बस्तियों वाली जिंदगी भी जीने लगा था। 【प्राचीनतम बस्ती के साक्ष्य― मेहरगढ़ , सिंध-बलूचिस्तान पाक०】 

~ महत्वपूर्ण खोज- खेती (प्रथम साक्ष्य- मेहरगढ़ , बलूचिस्तान : गेंहू और जौ) फसलें― गेंहू, जौ, ज्वार-बाजरा, सब्जियां आदि। 

~ धान की खेती का प्राचीनतम साक्ष्य― कोलडिहवा, प्रयागराज। 


नवपाषाण काल की प्रमुख विशेषताएं:-

~ मध्यपाषाण कालीन पशुपालन अब और विकसित हुआ। पालतू पशु- कुत्ता(प्रथम), भेड़ बकरी, सुअर, घोड़े इत्यादि।

~ प्रमुख व्यवसाय― खाद्य उत्पादन, पशुपालन, शिकार, मछली मारना आदि।

~ अभी तक मानव हस्तनिर्मित मृद्भाण्ड बनाता था किंतु अब मृदभांड चाक निर्मित बनने लगे थे। साथ ही उनपर चित्रकारी भी होने लगी थी। 

~ नवपाषाण कालीन पुरास्थलों से तकुए एवं करघे के अवशेषों से यह पता चलता है कि मनुष्य ऊन, सन, कपास के धागे से वस्त्र बुनना जानने लगे थे। 【विश्व में कपास का प्राचीनतम साक्ष्य - मेहरगढ़】 

~ शवाधान के 2 रूप मिलते हैं- 1. पूर्ण शवाधान, 2. आंशिक शवाधान। 

पूर्ण शवाधान- गोलाकार कब्र में मृतक को चित लिटा कर दफन

आंशिक शवाधान- जमीन की कब्र में मृतक की चुनी हुई हड्डियों का दफन

【बुर्जहोम से मालिक के साथ उसके कुत्ते को दफनाने की प्रथा मिलती है। तथा बलूचिस्तान में मृतक के साथ उसकी पालतू बकरी को दफनाने का साक्ष्य मिलता है।】


प्रमुख उपकरण – हत्थेदार पत्थर की कुल्हाड़ी (Celt), हँसियानुमा औजार, ओखली, मूसल, छेनी, छुरी, रुखानी, बर्मा, सुई, इत्यादि।

~ इस काल के पत्थर के औजार अपेक्षाकृत अधिक उपयोगी, सुडौल और पैने बनाये गए। तथा इन्हें पॉलिश करके चमकदार भी बनाया गया। इनमें हत्थे लगाने की भी व्यवस्था होती थी। 

~ ये औजार क्वार्टजाइट पत्थर को छोड़कर शेष सभी पत्थरों के बनाये जाते थे। 


प्रमुख पुरास्थल:- मेहरगढ़ (बलूचिस्तान), बुर्जहोम और गुफ़्कराल (कश्मीर), किली गुल मुहम्मद (क्वेटा पाटी, पाकिस्तान), राना घुंडई (बलूचिस्तान-पाकिस्तान). सराय खोला (रावलपिंडी, पाकिस्तान), चिराँद (बिहार) , मास्की ब्रम्हगिरि, हलुर, कोडिकल, संगनकल्लू (कर्नाटक), पिकालीहल, उटनूर (आंध्रप्रदेश), पैयामपल्ली (तमिलनाडु)  कोल्डीहवा व महागड़ा(उ०प्र०) आदि। 


● अब मानव कला और संस्कृति की ओर आकर्षित हो चुका था। तथा अनेक शिल्प कलाएं भी विकसित कर ली थी। 

वह अब खाद्य संग्राहक से खाद्य उत्पादक बन चुका था।


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निष्कर्ष:- 


इस प्रकार देखें तो अब पुरापाषाण कालीन मानव असभ्यता और बर्बरतापूर्ण जीवन को छोड़कर पूर्णतः विकास के पथ पर आगे बढ़ चुका था तथा नवपाषाण काल तक आते वह सभ्यता के दरवाजे पर खड़ा था। अर्थात यही नवपाषाण काल सभ्यता की उत्पत्ति का प्रारंभिक काल है। 

अब मानवों के जीवन का लक्ष्य बदल चुका था। जो पहले खाद्य संग्राहक हुआ करते थे अब वे खाद्य उत्पादन करने लगे थे तथा पशुपालन भी बहुत हद तक विकसित कर लिया था। 

अधिक अनाज उत्पादन ने उन्हें व्यापार की ओर मोड़ने का कार्य किया जिससे उनके सामाजिक और आर्थिक जीवन मे आमूलचूल परिवर्तन हुए। तथा अंततः सभ्यता विकसित हो उठी। 


धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलाहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय


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