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27 November 2020

हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा UPSC | Hindi sahitya ke itihas lekhan ki parampara

 राजनैतिक इतिहास की तरह साहित्येतिहास के लेखन की परम्परा, भारत वर्ष में नहीं थी। फिर ऐसी दशा में हिन्दी साहित्य के इतिहास की कैसे कल्पना की जा है। 

यद्यपि 9वीं शताब्दी तक केवल कुछ धार्मिक या साहित्यिक रचनाओं में हिन्दी साहित्य के कवियों के जीवन वृत या कृतित्व का परिचय दिया गया है। जैसे - चौरासी वैष्णवन की वार्ता, दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, भक्तमाल, कवि माला, कालिदास हजारा आदि।


 इनमें केवल कवि परिचय दिया गया है न कि उनका कालक्रम सन् संवत आदि न ही उनके कृतित्व व व्यक्तित्व का ही विवेचन किया गया है। ऐसी दशा में इनको साहित्येतिहास ग्रन्थ का रूप नहीं माना सकता है।

हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा 


हिन्दी साहित्य का इतिहास लेखन एक सुदीर्घ परंपरा है। अभी तक विद्वानों में आम सहमति यही स्थापित है कि इस परंपरा के केंद्र में आचार्य राम चन्द्र शुक्ल आते हैं। अतः इस सम्पूर्ण परंपरा को शुक्ल पूर्व और शुक्लोत्तर कालखण्डों में विभाजित किया जा सकता है। 


गौरतलब है कि शुक्ल पूर्व हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा के 2 रूप हैं। 

1. अनौपचारिक इतिहास लेखन

2. औपचारिक इतिहास लेखन


हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा

अनौपचारिक ग्रंथ वे हैं जो इतिहास लेखन के दृष्टिकोण से नहीं लिखे गए हैं फिर भी तथापि रचनाकारों अथवा कवियों के जीवनवृत्त का संकलन दिखाई पड़ता है। 


औपचारिक परंपरा का शुरुआत 19वीं शताब्दी से हुआ जब कुछ इतिहासकारों ने पहली बार हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन का प्रयास किया। 


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इतिहास क्या है?

●  प्राचीन भारतीय इतिहास के ऐतिहासिक स्रोत (साहित्यिक स्रोत)

प्राचीन भारतीय इतिहास के ऐतिहासिक स्रोत (पुरातात्विक स्रोत)

प्राचीन भारतीय इतिहास के ऐतिहासिक स्रोत (विदेशी विवरण)

हड़प्पा सभ्यता (एक दृष्टि में सम्पूर्ण)

हड़प्पा सभ्यता का उद्भव/उत्पत्ति

हड़प्पा सभ्यता का विस्तार

हड़प्पा सभ्यता की विशेषताएँ(विस्तृत जानकारी)

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सिन्धु घाटी सभ्यता के पुरास्थल(Sites of indus valley civilization)Part 3 |हड़प्पा(Harappa), मोहनजोदड़ो(Mohenjodaro)|हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख पुरास्थल


अनौपचारिक इतिहास लेखन:- 

अनौपचारिक इतिहास लेखन परंपरा की शुरुआत भक्ति काल तथा उसके आस पास होती दिखाई देती है। ऐसे प्रमुख प्रयास हैं– भक्तमाल, कालिदास हज़ारा, कविमाला, चौरासी वैष्णवन की वार्ता, दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता आदि। 

इस दृष्टि से सिख धर्म के आदि ग्रंथ को भी इसी क्रम में रखा जा सकता है। 


इन ग्रंथों में इतिहास बोध का आभास होते हुए भी अभाव है। इसमें रचनाकार के समय व तिथियों का भी उल्लेख नहीं है तथा सिर्फ कवियों के नाम व परिचय दिए हुए हैं। फिर भी ये ग्रंथ साहित्येतिहास लेखन की प्रथम प्रवृत्ति नहीं रखते हैं। इन ग्रंथों का परिचय इस प्रकार है― 



1. भक्तमाल:-


यह नाभादास द्वारा रचित हिंदी साहित्येतिहास लेखन का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें लगभग 200 भक्तो के जीवन चरित व उनके कृतियों का उल्लेख है। यह ग्रंथ इतिहास व साहित्य दोनों की दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। 


2. कविमाला:-


कविवृत्त संग्रह का सर्वप्रथम उदाहरण कविमाला है। इस ग्रंथ का प्रणयन यादराम के पुत्र तुलसीराम ने संवत 1712 में किया। इसमें संवत 1500 से 1700 तक के 75 कवियों का परिचय है। 

3. कालिदास हजारा:- 


महाकवि कालिदास का कालिदास हजारा एक अन्य महत्वपूर्ण कविवृत्त संग्रह है। जिसका व्यापक उपयोग परवर्ती संकलनकर्ताओं ने किया है। इस संग्रह में संवत 1450 से लेकर संवत 1775 तक के 212 कवियों के 1000 छंद संकलित हैं। यह ग्रंथ शिवसिंह सरोज का आधार ग्रंथ है। 


4. आदि ग्रंथ:-


गुरु अर्जुन देव ने सन 1604 ई० में आदि ग्रंथ का सम्पादन किया है। मध्यकालीन कविवृत्त संग्रह में आदि ग्रन्थ भी एक बड़ा दस्तावेज है। वस्तुतः यह मध्यकालीन सन्तो और भक्तों की वाणी को संग्रहित करने का प्रथम प्रयास है। कबीर की प्रामाणिक वाणी का स्रोत यही ग्रन्थ है। इसमें धन्ना, सेन, भीखन, परमानन्द, रामदास, बाबा सुंदर, गुरु नानक देव, गुरु अंगद , गुरु अमरदास, गुरु अर्जुनदेव, तथा गुरु तेगबहादुर आदि की वाणी संकलित है। 


औपचारिक साहित्येतिहास लेखन:-

औपचारिक इतिहास लेखन का प्रारंभ 19 वीं शताब्दी से गार्सा द तासी द्वारा रचित ग्रंथ से होता है। तब से यह परंपरा नियमित रूप से चलती रही। इसका विवरण निम्नलिखित है― 


हिंदी साहित्य का इतिहास सबसे पहले किसने लिखा? 


यदि उक्त प्रश्न की समीक्षा की जाय तो अब तक के ज्ञात विवरणों से यह स्पष्ट है कि फ्रेंच विद्वान गार्सा द तासी ने भरतीय हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास लिखा। जो कि फ्रेंच भाषा मे लिखा गया था। यह एक आश्चर्य की बात है कि भारत में बिना आये हुए हिंदी साहित्य का इतिहास एक विदेशी विद्वान ने लिखना आरम्भ किया। तासी भारत के विद्वानों से पत्राचार के माध्यम से जानकारी एकत्रित करके हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास लेखन का अद्भुत प्रयास किया। जिसका विवरण निम्नलिखित है―


1. गार्सा द तासी:- 


हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन का सर्वप्रथम प्रयास एक फ्रेंच विद्वान गार्सा द तासी का है। उन्होने फ्रेंच भाषा में 'इस्तवार द ला लितरेट्यूर एन्दुई ऐन्दुस्तानी' नामक ग्रन्थ की रचना की।

    इसके प्रथम भाग का प्रकाशन सन् 1839 ई. में हुआ था। इसमें हिन्दी तथा उर्दू के अनेक (738) कवियों का विवरण दिया गया है, जिसकी प्रमुख विशेषता है- उनका वर्ग क्रमानुसार व्यवस्थित होना । सन 1871 ई. में प्रकाशित इसके द्वितीय संस्करण को तीन खण्डों में विभक्त किया गया है, जिसमें पर्याप्त संशोधन तथा परिवर्तन किया गया है। वस्तुतः यह हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन का पहला प्रयास है। इसमें कवियों की रचनाओं के साथ ही उनकी रचना का काल भी दिया गया है। कवि - कृतियों का विवेचन में तासी ने भारतीय तथा योरोपीय विद्वानों द्वारा रचित सन्दर्भ-ग्रन्थों को अपने माध्यम के रूप में ग्रहण किया था ।

साहित्येतिहास लेखन के सन्दर्भ में तासी के ग्रन्थ का महत्व होते हुए भी इसे विशुद्ध साहित्येतिहास ग्रन्थ की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। इसके कई कारण हैं। 

इसमें वर्णित कवियों का विवरण कालक्रमानुसार नहीं है। काल-विभाग भी नहीं दिये गये हैं। युग की प्रमुख प्रवृत्तियों का भी विवेचन नहीं किया गया है। फिर भी इसका महत्व कम नहीं है। एक विदेशी विद्वान का इतना गंभीर तथा श्रमसाध्य प्रयास महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने भावी साहित्येतिहास-लेखकों को एक दृष्टि दी, सामग्री प्रस्तुत की। 


(2) भाषा काव्य संग्रह :


  हिन्दी के अनेक विद्वानों (डॉ नागेन्द्र व अन्य कई) ने साहित्येतिहास की परम्परा में फ्रेंच विद्वान गार्सा द तासी के बाद शिव सिंह सेंगर को दूसरा स्थान प्रदान किया है । किन्तु इन दोनों ग्रन्थों के मध्य में भाषा काव्य संग्रह को रखना न्यायोचित है। 


इस ग्रन्थ की रचना संवत 1930 में हुई तथा उस ग्रन्थ के संग्रह कर्ता महेश दत्त शुक्ल थे। 

कविताओं की संख्या और कवियों पर दी गई संक्षिप्त टिप्पणियों से यह एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ बन गया । इसके अंत में कठिन शब्दों का कोष भी प्रस्तुत किया गया है । 

इन विशेषताओं के होते हुए भी इसे विशिष्ट रूप से साहित्येतिहास ग्रन्थ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें अनेक कमियाँ हैं। जैसे कबीर, जायसी, धनानन्द जैसे अनेक महत्वपूर्ण कवियों का चयन नहीं किया गया है। संग्रहित कवियों के चयन में न तो कोई निश्चिय क्रम है और न ही ऐतिहासिक क्रम । 

फिर भी साहित्येतिहास लेखन की परम्परा में इसका विशेष महत्व है। डॉ0 आनन्द राय शर्मा के शब्दों में "भाषा काव्य संग्रह" का एक आनुषांगिक महत्व यह है कि इसने डॉ० शिव सिंह को न केवल 'सरोज' के निर्माण की प्रेरणा दी, प्रत्युत बहुत दूर तक उनका मार्गदर्शन भी किया।"


 3. शिव सिंह सेंगर:- 


हिंदी साहित्येतिहास लेखन की अनुपम परंपरा में शिवसिंह सेंगर का नाम अत्यंत उल्लेखनीय है। गार्सा तासी द्वारा अनुमोदित परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य इनके द्वारा किया गया।  शिवसिंह सेगर द्वारा लिखित “शिव सिंह सरोज" का महत्वपूर्ण स्थान है। इस ग्रन्थ की रचना सन् 1883 ई. में शिव सिंह द्वारा की गई थी।


 इसमें लगभग 1000 कवियों का परिचयात्मक विवरण हैं।  सम्पूर्ण विवरण वर्णनानुक्रम पद्धति से किया गया है ।


साहित्येतिहास की कसौटी पर कसने पर शिवसिंह सरोज' नामक ग्रन्थ खरा नहीं उतरना है। कवियों के जन्म पर समय उनकी रचनाओं का समय आदि अधिकतर अनुमान पर आधारित है। अतः विश्वसनीय नहीं है फिर भी इसके महत्व को कम नहीं किया जा सकता क्योंकि इसने बाद के साहित्येतिहास लेखकों को पर्याप्त सामग्री प्रदान की है।


4. द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान : 

जार्ज ग्रियर्सन द्वारा लिखित मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिट्रेचर ऑफ हिन्दुस्तान वस्तुतः हिन्दी का प्रथम साहित्येतिहास ग्रन्थ कहलाने का अधिकारी है। जार्ज इब्राहिम ग्रियर्सन ने सन् 1888 में 'दा मार्डन वर्नाकुलर लिटरेचर आफ हिन्दुस्तानी' नामक कृति की रचना की है।


 इसमें विभिन्न साहित्यकारों की विभिन्न प्रवतियों को दर्शाते हुए उनका काल क्रमानुसार वर्गीकरण किया गया है हिन्दी के विकासात्मक स्वरूप का निर्धारण यहीं से शुरू हुआ है। इस ग्रन्थ में लिखित प्रत्येक खण्ड किसी न किसी विशेष कालावधि के द्योतक हैं जिनमें चारण काव्य, धार्मिक, काव्य तथा प्रेम काव्य आदि का आभास होते हुए भी अभाव सा है।

 इस कृति में भक्तिकाल को स्वर्ण युग कहने की सुन्दर उक्ति मिली है । अंग्रेजी विषय में संकलित होने के कारण यह ग्रन्थ हिंदी इतिहास लेखकों के लिए विशेष प्रेरक नहीं बन सका।


5. मिश्र बंधु:-


मिश्रबन्धुओं ने 'मिश्र बन्धु विनोद' नामक पुस्तक में हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा । इस ग्रन्थ के चार भाग दिखाये गये है। तीन भागों का प्रकाशन सन् 1913 ई० तथा चौथे भाग का प्रकाशन 1934 ई० में सामने आया। इस ग्रन्थ की रचना का आधार काशी नागरी प्रचारिणी सभा की खोज रिपोर्ट थी। इस साहित्येतिहास-ग्रन्थ में शामिल कवियों की संख्या 5000 हैं। मिश्र बन्धुओं ने अपने साहित्येतिहास को 8  कालखण्डों में विभाजित कर प्रत्येक युग के रचनाकारों के रचनात्मक योगदान का प्रदर्शित किया है। 


मिस्रबन्धुओं ने इस ग्रन्थ को साहित्येतिहास न मानते हुए भरसक प्रयास किया है कि यह एक आदर्श इतिहास सिद्ध हो सके इसके लिए उन्होंने विविध कृतियों, विविध लेखों, खोज विवरणों आदि से सामग्री एकत्र की है। फिर भी इसमें इतिहास की दृष्टि से अनेक त्रुटियाँ हैं जैसे इसमें निर्धारित विभिन्न कालों की अवधि में बहुत असमानता है। इसमें दिये गये विभाजन के नामकरण का कोई निश्चिय आचार नहीं है ।

 

उपरोक्त त्रुटियों के बावजूद आचार्य शुक्ल ने मिश्र बन्धुओं के महत्व को स्वीकार करते हुए लिखा है - "कवियों के परिचयात्मक विवरण में प्रायः मिश्र बन्धुओं विनोद से लिए है।"

 मिश्र बन्धु विनोद परवर्ती इतिहास लेखकों के लिए एक आधार ग्रन्थ का काम करता रहा है।



6. आचार्य रामचंद्र शुक्ल:- 


साहित्येतिहास-लेखन की परम्परा में सबसे उल्लेखनीय आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी हैं। उन्होंने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाए और सुव्यवस्थित इतिहास लिखकर इतिहास-लेखन की परम्परा में एक नये युग और नयी चेतना की शुरूआत की। 

आचार्य शुक्ल का 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' नामक ग्रन्थ पहले 'हिन्दी शब्द सागर' की भूमिका के रूप में लिखा गया था, और फिर 1929 ई० में परिमार्जन के साथ अलग पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। 


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने रचनाकार चयन की गहरी दृष्टि अपनायी। चयन प्रक्रिया का उल्लेख  करते हुए उन्होंने 'मिश्रबन्धु विनोद' के पाँच हजार कवियों में से लगभग एक हजार प्रतिनिधि कवियों को ही अपने इतिहास में स्थान है।। 

   वास्तव में, आचार्य शुक्ल ने इतिहासकार की तथ्यपरक दष्टि की अपेक्षा साहित्यलोचन की गहरी और पारदर्शी दष्टि को प्रमुखता दी यही अद्भुत मूल्यांकन की क्षमता ही उनके इतिहास की प्राण शक्ति का पुंज है।

अनेक विशेषताओं के बाद भी शुक्ल के इतिहास में भी कतिपय भ्रान्तियाँ और कमियाँ दिखायी पड़ती हैं। अधुनातन शोधों से वीरगाथा काल के नामकरण सामग्री और प्रवत्तियों के विषय में आचार्य शुक्ल की मान्यताएँ और धारणाएँ आधारहीन सिद्ध हो चुकी हैं. ऐसे ही और भी स्थलों पर कुछ कमियाँ देखी जा सकती हैं। फिर भी शुक्ल का साहित्येतिहास साहित्येतिहास-लेखन की परम्परा में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी का काम करता रहा है।


7. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी:- 


हिन्दी साहित्येतिहास की परम्परा में अन्य महत्वपूर्ण ग्रन्थ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित "हिन्दी साहित्य की भूमिका" है । इस ग्रन्थ के प्रणयन् में लेखक द्वारा जिस क्रम और पद्धति को अपनाया गया है वह विशुद्ध रूप से इतिहास नहीं है। परंतु आचार्य द्विवेदी ने विविध स्वतन्त्र लेखों के द्वारा कुछ ऐसे तथ्यों और निष्कर्षों का प्रतिपादन किया है जो अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 


द्विवेदी जी ने इनके द्वारा एक नवीन दृष्टि, नई सामग्री और नूतन व्याख्या प्रस्तुत की है। आचार्य शुकल ने साहित्येतिहास लेखन में युगीन जन प्रवृत्तियों को महत्व दिया था। इसके विपरीत आचार्य द्विवेदी ने युगीन प्रभाव के एकांगी दृष्टिकोण पर आधारित धाराणाओं को खण्डित करते हुए परम्परा के महत्व को स्थापित किया। आचार्य द्विवेदी जी ने सिद्धों और नाथपंथियों के वैचारिक विषय और अभिव्यक्ति की शैलियों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए संत कबीर पर उनके प्रभाव को रेखांकित किया। इसके साथ ही उन्होंने संत साहित्य और वैष्णव भक्ति काव्य के ऐतिहासिक मूल्यांकन के लिए एक सर्वथा नवीन दृष्टिकोण प्रदान किया।


आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के कुछ और साहित्येतिहास संबंधी ग्रन्थ हैं। जैसे 'हिन्दी साहित्यः उद्भव और विकास', 'हिन्दी साहित्य का आदिकाल' आदि इन ग्रन्थों में उनके साहित्येतिहास लेखन संबंधी चिंतन और दृष्टिकोण का और अधिक सम्पुष्ट तथा सुव्यवस्थित रूप देखने को मिलता है। 

8. रामकुमार वर्मा:-


इतिहास लेखन की परम्परा में आचार्थ द्विवेदी के बाद डॉ. रामकुमार वर्मा का "हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास" प्रकाशन हुआ। इसमें लेखक ने 693 ई. से 1693 ई.  तक की कालावधि को लेकर भक्तिकाल तक के इतिहास का आलोचनात्मक अध्ययन किया है जो कि ऐतिहासिक, साहित्यिक और भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से सर्वथा अवांछनीय है।

 काव्यधाराओं के नामकरण में लेखक ने 'सन्तकाव्य' व 'प्रेमकाव्य' आदि शीर्षकों का सार्थक प्रयोग किया है। साहित्यकारों के मूल्यांकन में लेखक ने काव्यात्मकता, सहृदयता एवं नैसर्गिक कवि हृदय का परिचय दिया है। परिणामतः शैली प्रवाहपूर्ण, रोचक, सरस और हृदयावर्णक है।


9. हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास : 


काशी नागरी प्रचरिणी सभा ने हिन्दी साहित्य का बृहत इतिहास नामक ग्रन्थ कई भागों में प्रकाशित किया है । साहित्येतिहास का यह सर्वाधिक सुदीर्घ ग्रन्थ है। विभिन्न भागों में साहित्य की विस्तृत सामग्री प्रस्तुत की गई है। 


इसका प्रमुख आकर्षण है - विविध भाषाओं में हिन्दी साहित्य का प्रस्तुतीकरण। प्रत्येक भाग अलग - अलग विद्वानों के सम्पादन में तथा विभिन्न लेखकों के सहयोग से सृजित किया गया है। इस ग्रन्थ ने हिन्दी साहित्येतिहास की बिखरी हुई सामग्री को एक जगह एकत्र करके उसका मूल्यांकन करने में सफलता प्राप्त की है। इस दृष्टि से इस ग्रन्थ की हिन्दी साहित्येतिहास लेखन परम्परा में, विशिष्ट भूमिका है। 

10. डॉ धीरेन्द्र वर्मा:-


डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा लिखित व संपादित "हिन्दी साहित्य" अनेकों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण प्रतीत होता है इसमें सम्पूर्ण साहित्येतिहास को 3 काल खण्डों (आदिकाल, मध्यकाल तथा आधुनिक काल) में विभक्त किया गया है। 

'रासो काव्य परम्परा' को नवीन रूप से जोड़ा गया है। काल विभाजन, विषय-निरूपण एवं शैली आदि की दृष्टि से उक्त ग्रन्थ आचार्य शुक्ल के इतिहास से काफी भिन्न है । कई रचनाकारों  द्वारा रचित होने के कारण इसमें एकरूपता और अनवरतता का अभाव है।


11. डॉ नागेन्द्र:-


 डॉ० नगेंद्र द्वारा सम्पादित ग्रन्थ 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' साहित्येतिहास लेखन परम्परा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। सन् 1963 ई. में प्रकाशित इस ग्रन्थ में विभिन्न विशिष्ट विद्वानों की रचनाएं संकलित हैं। यह एक विस्तृत ग्रन्थ है। इसमें सर्वप्रथम साहित्येतिहास के पुर्नलेखन की समस्याओं को उठाया गया है । भूमिका के रूप में हिन्दी भाषा के उद्भव, विकास तथा स्वरूप की विवेचना प्रस्तुत की गयी है। 


तदनन्तर हिन्दी साहित्य के आदिकाल से लेकर अद्यतन साहित्य का गंभीर अध्ययन विवेचन प्रस्तुत किया गया है। हिन्दी के पद्य तथा गद्य दोनों विधाओं का सुदीर्घ, सतर्क तथा सार्थक विवेचन इस ग्रन्थ की प्रमुख विशेषता है ।

 इस प्रकार डॉ० नगेंद्र द्वारा 'सम्पादित' यह ग्रन्थ साहित्येतिहास लेखन के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए हिन्दी साहित्य का, विभिन्न कालों के अंतर्गत, समग्र रूप में मूल्यांकन करता है। इसके साथ ही साहित्येतिहास का स्वरूप, लेखन-पद्धति परम्परा, नामकरण तथा काल निर्धारण आदि का गंभीर विवेचन इस ग्रन्थ की विशिष्टता है।


निष्कर्ष:-


हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा सतत चलती रही है। पूर्वकालीन इतिहास ग्रन्थों से प्रेरणा लेते हुए नई मान्यताओं और मौलिकताओं के साथ नए इतिहास ग्रन्थ सामने आते रहे हैं। हिंदी साहित्य के प्रारम्भिक इतिहास लेखक गार्सा-द- तासी से लेकर आज तक इस दिशा में क्रमिक विकास चलता रहा है। समय-समय पर नई दष्टि, नई पद्धति और नए चिन्तन के आधार पर अनुकूल और सन्तोषजनक साहित्य इतिहास के तथ्यों का उद्घाटन होता रहा है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि हिंदी साहित्य के इतिहास की सुदढ़ परम्परा सतत् प्रवाहित होती रही है ।


धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलाहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  हिंदी विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद विश्वविद्यालय




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1 comment:

  1. Brother I am also from Allahabad University , u are my senior .

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