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06 April 2020

Harappan civilization (हड़प्पा सभ्यता) Indus valley civilization (सिंधु घाटी सभ्यता) हड़प्पा संस्कृति | Harappan culture. Harappa sabhyta (नवीनतम जानकारियां)

सिंधु घाटी सभ्यता(indus valley civilization) 2500 ई.पू. के आस पास अपनी पूर्ण विकसित अवस्था में प्रकट होती है।
हड़प्पा सभ्यता


हड़प्पा सभ्यता

सिन्धु सभ्यता वास्तव में भारतीय ही है। यह भवन निर्माण और उद्योग के साथ - साथ वेश भूषा तथा धर्म में आधुनिक भारतीय संस्कृति का आधार है ।
मोहनजोदड़ो में ऐसी विशेषताएं दृष्टिगोचर होती है ऐतिहासिक भारत में सदा विद्दमान रहीं हैं।..........प्रो० गार्डन चाइल्ड

इयं में गंगे यमुने सरस्वती शुतुद्री स्तोमं सचता परुषण्या।
असिकन्या मरुद्वधे वितसत्यार्जीकीये शृणुह्या  सुषोमया।।                ...... ऋग्वेद

सिन्धु एवं उसकी सहायक नदियों की घाटियों में इस भारतीय बहुचर्चित कांस्य सभ्यता का विकास हुआ।
इसका प्रसार अरब सागर से लेकर   सुदुर j&k की पहाड़ियों तक था ।

सामन्यतः इसे सिन्धु सभ्यता के नाम से जाना जाता है। सिन्धु घाटी की सभ्यता एक विशिष्ट वातावरण में मानव जीवन के एक  सर्वांगीण समायोजन का प्रतिनिधित्व करता है।
" भारत प्रारम्भ से ही अनेक साधनों में उन्नति कर ली है वह साधनों से अनजान नहीं था अतः भारत को हम प्रारंभ से ही बालक के रूप में नहीं अपितु एक  प्रौढ़ के रूप में देख सकते हैं, कहने का भाव यह है कि भारत के गौरवशाली इतिहास में हम भारत को हड़प्पा सभ्यता से ही एक विकसित रूप में देख रहे हैं। और न केवल सुंदर वस्तु की रचना की बल्कि आज की सभ्यता के उपयोगी और विशेष चिन्ह अच्छे हम्मानो और नालियों को भी तैयार किया है।"
इस सभ्यता की उत्पत्ति के विषय में कहा गया है कि
"सिंधु घाटी सभ्यता का कोई प्रारंभिक चरण अभी तक सकारात्मक रूप से पहचाना नहीं गया है।"

हड़प्पा सभ्यता का विस्तार (extent of harappan civilization):

वर्तमान समय में उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस सभ्यता का भौगोलिक विस्तार उत्तर में मांडा( j & k) से लेकर दक्षिण में नर्मदा के मुहाने ( भगतराय) तक एवं पश्चिम बलूचिस्तान के मकराल समुद्र तट से लेकर उत्तर-पूर्व में मेरठ तक है।

Hadappa sabhyta ka vistar map
हड़प्पा सभ्यता का विस्तार


हङप्पा सभ्यता से संबंधित अन्य लेेेख:-

● हड़प्पा सभ्यता का उद्भव/उत्पत्ति

● हड़प्पा सभ्यता का विस्तार

● हड़प्पा सभ्यता की विशेषताएँ (विस्तृत जानकारी)

● हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख पुरास्थल|sites of Indus valley civilization| (Part 1)  चन्हूदड़ो, सुतकागेंडोर, बालाकोट, अल्लाहदीनो, कोटदीजी, माण्डा, बनावली

● हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख पुरास्थल|sites of indus valley/harappan civilization (Part 2)| रोपड़, भगवानपुरा, कालीबंगन, लोथल, सुरकोटदा, धौलावीरा, देसलपुर, कुंतासी, रोजदी, दैमाबाद, हुलास, आलमगीरपुर, माण्डा, सिनौली

● सिन्धु घाटी सभ्यता के पुरास्थल(Sites of indus valley civilization)Part 3 |हड़प्पा(Harappa), मोहनजोदड़ो(Mohenjodaro)|हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख पुरास्थल


इस समूचे त्रिभुजाकार क्षेत्र का क्षेत्रफल 1299600 km2 है जो प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया से भी निश्चित रूप से बड़ा है।
सन 1922 ई० में जॉन मार्शल ने इस संबंध में लिखा है कि मौर्य साम्राज्य के उदय से भी सुविकसित और समृद्ध सभ्यता का अस्तित्व था। लेकिन उन युगों में निर्मित स्मारकों का राजगृह की साइक्लोपीयन प्राचीर को छोड़ कर कोई उदहारण अवशिष्ट नही है।

सिन्धु सभ्यता की विशुद्धता भारतीय है। इसका रुप व प्रयोग मौलिक एवं स्वदेशी है। यह अलग बात है कि अपने चर्मोत्कर्ष काल मे सिन्धु सभ्यता अन्य समकालीन सभ्यताओं ने सम्पर्क स्थापित किया। वस्तुतः इस सम्पर्क से इसकी मौलिकता पर कोई आँच नही आता है।
इस संस्कृति के विकास में विदेशों से सम्पर्क होना स्वाभाविक ही है। यह आश्चर्यजनक है कि इतने व्यापक भौगोलिक विस्तार के बावजूद इस सभ्यता में अदभुत एक रुपता दृष्टिगोचर होती है।
रहन- सहन के संदर्भ में इस सभ्यता के लोगों का स्तर उन्नत था। 

सैंधव सभ्यता नगर व्यवस्था, भवन विन्यास, सड़कों एवं जल निकास के लिए पक्की एवं ढकी हुई नालियां इस सभ्यता की उन्नत अवस्था की परिचायक है।

सिंधु घाटी सभ्यता का नगर नियोजन(Town planning of Indus valley civilization):

सिंधु सभ्यता मूलतः एक नगरीय सभ्यता थी ।
इन नगरों के बारे मे विशिष्ट बात यह थी कि ये सम्यक रूपेण विख्यात थे। सिन्धु सभ्यता से सम्बंधित अनेक पुरास्थल- राजस्थान, गुजरात यहाँ तक कि सुदूर केरल में भी हाल ही के खुदाई में पाये गये है।

पेनसिल वेनिया विश्वविद्यालय की ओर से जो उत्खनन कार्य हालही में कराये गये उसके आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि ई०पू० 2000 के आसपास मोहनजोदड़ो नगर में एक वर्ग मील में औसतन 40 हजार निवासी रहते थे।
इस समय तक इस नगर का महत्व बना हुआ है यहां की निवासी नगर निर्माण प्रणाली से पूर्णत: परिचित थे।
इतिहासकार दीक्षित के अनुसार,"ऐसी उत्तम प्रणाली संसार के अन्य किसी प्राचीन देश में देखने को नहीं मिलती हैं। यहां की इमारतों में पकी ईटो का प्रयोग होता था।
ऐसा प्रतीत होता है कि शहर एक निश्चित योजना के आधार पर बसाया गया था।

नगरों की रक्षा के लिए चारों ओर दीवारों का प्रबंध था।
हड़प्पा में नगर रक्षा की दीवारों को कच्ची इटो से बनाया गया था।मकान के प्रायः 2 खण्ड होते थे।
मोहनजोदड़ो के भवनों में आम सड़कों की अपेक्षा मुख्य सड़कों की ओर कम दरवाजे पाये गये है।
ऊपरी खण्डों पर जाने के लिए सीढ़ियां बनी होती थी।एक ही योजना निर्माण का आधार थी। बड़े -बड़े मकानों में अतिथि गृह और विश्रामगार का भी प्रबन्ध था।
चूल्हे मकान के बाहर बनते थे।
मोहनजोदड़ो की अपेक्षा हड़प्पा में कम कुएँ मिले हैं।नालियों का इतना सुंदर प्रबन्ध था कि अन्य प्राचीन देशों में ऐसा प्रबन्ध नहीं मिलता।

इन संरचनाओं में मोहनजोदड़ो का प्रसिद्ध स्नानागार भी है जो एक बन्द तलाब के रूप में था।इस तलाब का प्रयोग अनुष्ठानिक कार्यो के लिए किया जाता है।
A swimming bath an a scale which do credit to a modern sea side hotel.
नालियां 2 से 18 इंच तक गहरी थीं।

प्रो० चाइल्ड के अनुसार,"नालियों की सुंदर पंक्तियों और नालियों का अति उत्तम प्रबन्ध और उनकी नियमित सफाई की व्यवस्था इस बात का संकेत करती है कि यहाँ चुस्त एवं नियमित नगर शासक की व्यवस्था रही होंगी।"

हड़प्पा व मोहनजोदड़ो दोनों नगर लगभग 5km के घेरे में बसा हुआ था।इन दोनों नगरों तथा कालीबंगा(राजस्थान) सुरकोटदा आदि नगर निर्माण योजना में पर्याप्त समानता दृष्टिगोचर होती है।
सिन्धु सभ्यता की नगर योजना में सड़कों का महत्व पूर्ण योगदान था।इस संदर्भ में यह सभ्यता अपनी समकालीन मिस्र और सुमेरियन से भिन्न और अधिक विकसित प्रतीत होती है।
मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी सड़क 33 फुट चौड़ी थीं।सम्भवता यह राजमार्ग था। चौराहे की तुलना आक्सफोर्ड सर्कल से की गई है। 

ये कहना गलत न होगा कि भवन निर्माण कला में सिन्धु घाटी के निवासी उस समय अद्वितीय थे। ईटो से चौकोर मकान बनाने की कला सिन्धु सभ्यता ने ही भावी भारत को दी है।
नवीन उत्खनन में हरियाणा के रोहतक जिले में फरमाणा गाँव में जो हड़प्पा स्थल मिला है वहां से एक मकान में 26 कमरे , रसोई व आंगन है ।
दूसरी ओर केरल के उत्तर कोच्चि में कुछ सिन्धु सभ्यता के समान नागरीय बस्तियां मिली है। किन्तु किसी विशेष नगर विन्यास प्रणाली का ज्ञान नहीं होता है।जैसा कि गुजरात में पाए गये बनासकंठ नामक पुरास्थल में हुआ था। जहां पर चूडियों को बनाने का कारखाना मिला था।

उत्खनन से प्राप्त नवीन व प्राचीन साक्ष्यों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि सिन्धु घाटी के लोग भवन निर्माण कला में, में पूर्ण रूप से दक्ष थे सिन्धु सभ्यता की निर्माण प्रणाली सुविकसित एवं प्रौढ़ थी। जिससे यह प्रमाणित होता है कि भवन निर्माण कला चर्मोत्कर्ष पर पहुंच चुकी थी।


             " सिन्धु सभ्यता का उदभव"

        Origin of Indus civilization



क्या सिंधु सभ्यता के निर्माता आर्य थे ? अनेक विद्वान यह विश्वास करते हैं कि वैदिक आर्य इस सभ्यता के निर्माता थे। लेकिन यह मत स्वीकार प्रतीत नही होता है  क्योकि मार्शल का कहना है कि वैदिक और सिन्धु सभ्यताएँ परस्पर भिन्न है।

वैदिक आर्यो की सभ्यता ग्राम व कृषि प्रधान थी तथा सिन्धु सभ्यता के निर्माता पाषाण व कांस्य के उपकरणों का प्रयोग करते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सभ्यता आकस्मिक रूप से विकसित हुई क्योंकि इस मे नगर सभ्यता के सभी तत्व विद्यमान थे।अनेक प्रश्न पुराविदों को बराबर उत्तेजित करते रहे हैं कि सिन्धु सभ्यता के निर्माता कौन थे? और वे कहाँ से आये थे?
यदि इस सभ्यता के निर्माता बाहर से नहीं आये थे तो स्थानीय परिवेश से विकसित इस सभ्यता के आघ एवं आरम्भिक रुप से क्यो नहीं मिलते हैं ?
हड़प्पा संस्कृति के उदभव के संदर्भ में 2 मत है:-

1)देशी उतपत्ति का मत :-

 

 रफीक मुगल, स्टूअर्ट पिग्गट ,जार्ज डेल्स , फेयर सर्विस इत्यादि विद्वानों का मत है कि हड़प्पा संस्कृति स्थानीय संस्कृतियों से विकसित हुई।
हड़प्पा संस्कृति के आरम्भ के पूर्व जो ग्राम संस्कृतियाँ विकसित हुई थी वे ही हड़प्पा संस्कृतियों का मूल आधार है।

2) विदेशी उत्तपत्ति का मत :-


  विदेशी उत्तपत्ति का मत गार्डेन चाइल्ड, सर जॉन मार्शल मार्टिमर ह्वीलर आदि का मत है कि हड़प्पा संस्कृति के दजलाफारत नदियों की घाटियों में विकसित मेसोपोटामिया की सभ्यता से प्रेणना ग्रहण की थी।
Dr. राजबली पांडेय का कहना है कि वेदों और पौराणिक अनुश्रुतियों से पता चलता है कि म० प्र०  के अपने प्रसार में आर्यो को पश्चिमोत्तर भारत के असुरो से काफी लड़ना पड़ा था। आर्यो से पराजित होकर ये ईरान और सुमेर में जा बसे।
सम्भवतः सिंधु सभ्यता के निर्माता यहीं थे ।

हड़प्पा संस्कृति के निर्माता के सम्बंध में निम्न तर्क दिये हैं।:-
1) आर्य:- डॉ. राजबली पाण्डेय
2) सुमेरियन:- गार्डन चाइल्ड
3) पणि:- वेदों में उल्लिखित
4) द्रविड़:- राखालदास बनर्जीब
5) दास व दस्यु:- मार्टिमर ह्वीलर

  निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि सिन्धु घाटी सभ्यता का उद्भव स्थानीय संस्कृतियों का योगदान था।

सिन्धु सभ्यता की विशेषताएं:- Characteristics of Indus civilization : 

सिन्धु सभ्यता कुछ आधारभूत विशेषताएँ रखती हैं। सिन्धु-सभ्यता के सम्यक् बोध के लिए इन विशेषताओं को हृदयंगम कर लेना अति आवश्यक है: -

(1). सिन्धु-सभ्यता तृतीय काँस्यकाल (Bronze Age) की सभ्यता है। इसमें काँस्यकाल की सर्वोत्कृष्ट विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं।


(2). यह सभ्यता नगरीय तथा व्यापार-प्रधान है। इसके अन्तर्गत सिन्धुवासियों ने आश्चर्यजनक उन्नति की थी। विशाल नगरों, पक्के भवनों, सुव्यवस्थित सड़कों, नालियों और स्नानागारों के निर्माता, सुदृढ़ शासन-पद्धति और धार्मिक व्यवस्था के व्यवस्थापक तथा आन्तरिक उद्योग-धन्धों और विदेशी व्यापार के संगठनकर्ता सिन्धु निवासियों की चतुर्दिक अभ्युन्नति के पीछे साधना और अनुभव की एक सुदीर्घ परम्परा थी। सिन्धु-प्रदेश की सुख-शान्ति और विलासिता को देखते हुए जॉन मार्शल ने लिखा है कि "यहाँ साधारण नागरिक सुविधा और विलास का जिस मात्रा में उपभोग करता था उसकी तुलना समकालीन सभ्य संसार के अन्य भागों से नहीं हो सकती।"

(3). सिन्धु सभ्यता शांति मूलक थी। उसके संस्थापक को युद्ध से अनुराग न था यही कारण है कि सिन्धु-प्रदेश के उत्खनन में कवच, शिस्त्राण और ढाल नहीं मिले हैं। जो अन्य अस्त्र-शस्त्र-धनुष-बाण, भाला, कुल्हाड़ी आदि-उपलब्ध हुए हैं उनका प्रयोग वहुधा आत्मरक्षा अथवा आखेट के लिए ही किया जाता था।

(4). यह सभ्यता समष्टिवादिनी थी। सिन्धु-प्रदेश के उत्खनन में राज सामग्री के स्थान पर सार्वजनिक सामग्री ही मिली है। विशाल सभा-भवन, और स्नानागारों के ध्वंसावशेष सिन्धु-प्रदेश के सामाजिक जीवन के परिचायक हैं।

(5). सिन्धु-प्रदेश का आर्थिक जीवन औद्योगिक विशेषीकरण (Industrial specialisation) और स्थानीयकरण (Localisation) पर अवलम्बित था। इस प्रणाली के अन्तर्गत अधकांश व्यवसायी प्रायः एक ही व्यवसाय का अनुसरण करते थे। समान व्यवसाय के अनुसरणकर्ता प्रायः एक ही मोहल्ले में रहते थे।



 (6). सिन्धु-सभ्यता के अन्तर्गत धर्म द्विदेवतामूलक था। सिन्धु-निवासी की श्रद्धा-भक्ति के प्रमुख केन्द्र थे दो देवता-एक पुरुष के रूप में और दूसरा नारी के रूप में।

(7). सिन्धु-सभ्यता में लेख, गणना और माप की भी प्रतिष्ठा हो चुकी थी।

  -:  धार्मिक विश्वास एवं मान्यताएं :-

  Religion of harappan civilization

सिन्धु घाटी के उत्खनन से प्राप्त विविध सामग्रियों द्वारा प्रायः सिद्ध हो चुका है कि उस सभ्यता के धार्मिक विकास एवं जीवन की पृष्ठभूमि में एक दीर्घकालीन परम्परा थी।
डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी के अनुसार यह धर्म कुछ बाहरी अंगो के होते हुए भी मुख्यतः इसी भूमि की उपज था। और हिंदू धर्म का पूर्व रूप जिसमें आज की कई विशेषताएँ पायी जाती है जैसे:- शिवशक्ति की पूजा, नाग पूजा, पशुपक्षी पूजा, वृक्ष व पाषाण पूजा , लिंग पूजा व योग आदि।

मातृदेवी की उपासना:- मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ों तथा हड़प्पा से मिट्टी की बनी हुई मातृदेवी की मूर्तियां, मुद्राओं पर अंकित चित्र आदि मातृदेवी की विभिन्न रूपों तथा प्रतीकों की उपासना के परिचायक है।
कुछ ऐसी मूर्तियां मिली है जिसमें एक नारी बच्चे के साथ प्रदर्शित है।मार्शल ने इसका समीकरण मातृदेवी से किया है
प्रशन यह है कि क्या प्रमाण है कि ये पूजा परख मूर्तियां है?
इस संदर्भ में मैके ने कुछ साक्ष्यों की ओर विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया है।
इन मूर्तियों पर धुयें के निशान है।यह सम्भावना है कि इन मूर्तियों के सामने पूजा के लिए कोई वस्तु जलायी गयी होगी जिससे ये निशान पड़ गए।
जॉन मार्शल के अनुसार," सिंधुप्रदेश में मातृदेवी को आदिशक्ति के रूप में पूजा जाता था।
ये मूर्तियां टर्की, सीरिया, ईरान, बलूचिस्तान की कुल्ली संस्कृति, अफगानिस्तान के मुंडिगाक पुरास्थल से प्राप्त मातृदेवी की मूर्तियों से ये आभास होता है कि सिन्धु सभ्यता के बाहर मातृदेवी की उपासना प्रचलित थी। 

पशुपति की उपासना:- सिन्धु घाटी से प्राप्त एक मुद्रा पर शिव के प्रारम्भिक रूप परमपुरुष की आकृति में अंकित है।
इसके तीन मुख है। इसके दाहिने ओर हाथी तथा बाघ तथा बायीं ओर गैंडा व भैसा है। इस मूर्ति का निरूपण करते हुए राधाकुमुद मुखर्जी ने लिखा है।,"उसकी संज्ञा ऋग्वैदिक रुद्र या शिव के समान पशुपति सिद्ध होती है।

पशुपूजा:- मुद्राओ पर कई प्रकार के पशुओं का चित्रण मिलता है।इससे पता चलता है कि पशुपूजा भी प्रचलित थी। एक मुद्रा पर नाग की पूजा करते हुए एक व्यक्ति का चित्र मिला है। सबसे प्रचलित पशु "कूबड़ दार बैल" थे ।
" संभवतः शिव नन्दी की पूजा का प्रारंभ भी यही से हुआ था।"

वृक्ष पूजा:- भारत में चिरकाल से वृक्षों में देवी -देवताओं की आत्माओं के अस्तित्व में विश्वास रहा है।
एक मुद्रा में पशु के जुड़वा सिरो के बीच में नवपीपल का धार्मिक महत्व आज भी है।

योग:-  प्राचीन भारत में योग की परम्परा का धार्मिक महत्व रहा है। मोहनजोदड़ो से एक मुहर में एक पुरूष की आकृति पद्मासन मुद्रा में है जिसमें निम्नांकित वर्णित है।
"अन्तरक्ष्य बहि दृष्टी निशेप्नयेष वर्जितः"
सिन्धु घाटी का धर्म केवल विश्वास तथा आस्था पर निर्भर था।अभी तक जितने भी प्रमाण उत्पन्न हो पाये है।उसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि हम यह प्रमाणित करने में सर्वथा असफल रहे कि सिन्धु निवासियों का कोई धर्म था या नहीं।
इस विषय में तब तक मौन रहना होगा जब तक सिन्धु लिपि बोधगम्य न हो जाये।फिर हम इतना तो निश्चय पूर्वक कह सकते हैं कि सिन्धु निवासी बहुदेववाद में आस्था रखने के साथ- साथ एकेश्वरवादी भी थे।
इसी एकेश्वरवाद के आधार पर उन्होंने परमपुरुष तथा मातृदेवी के मध्य द्वंदात्मक विचारों को जन्म दिया।

             सिंधु घाटी सभ्यता की तिथि

Dating of Indus valley civilization


सिन्धु लिपि के अभी तक न पढ़े जाने के कारण सिन्धु सभ्यता के कालानुक्रम पुरातत्वविदो के लिए विवाद का विषय है। इसका एक कारण यह है कि जहां इसकी समकालीन मेसोपोटामिया एवं मिस्र की सभ्यता में एक प्रवाह दिखाई पड़ता है वहीं इसमें इसका नितांत अभाव है।
भिन्न - भिन्न विद्वानों ने अपने तर्को पर तिथि का निर्धारण किया है।जो भिन्न हैं ।
1) जॉन मार्शल:- 3250 ई०पू० ~2750 ई०पू०
2) मैके:- 2800BC. ~25BC.
3) माधवस्वरूप वत्स:- 3500BC. ~ 2700BC.
4) मार्टिमर ह्वीलर:- 2500BC. ~ 1500BC.
5) सी० जे० गैड:- 2300BC.~1700BC.
6) फेयर सर्विस :- 2000BC.~ 1500BC.
7) D. P. अग्रवाल:- 2300BC.~ 1750BC.
8) अमलानन्द घोष:- 2500 BC.~ 1700BC.
9) आलचीन:- 2150 BC. ~ 1750BC.
(1) Early Harappan (3300~2600)BC.
A● Ravi phase :- 3300 ~ 2800BC.
B●Kotdiji:- 2800~ 2600BC.
(2) Mature phase :- 2600~2000/ 1900BC.
(3) Late phase :- (2000~1900)~C~(1500/1300BC.)
C=calibrated date
C-14  जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2350~1750 BC. मानी जाती है। 

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हड़प्पा संस्कृति के पतन के कारण

the collapse of the harappan culture


हड़प्पा संस्कृति के  पतन के विभिन्न कारण विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रतिपादित किया गया है ये निम्न है।:-
1) बाह्य आक्रमण:- मार्टिमर ह्वीलर
2) जलवायु परिवर्तन:- ऑरेल स्ट्रेन और A.N. घोष
3) भुतात्विक परिवर्तन:-M.R. साहनी, R.L. राइक्स, F. डेल्स,H.T.लम्ब्रिक
4) बाढ़:- जॉन मार्शल, अर्नेस्ट मैके,S.R.राव
5) प्रशासनिक दुर्बलता:- सर जॉन मार्शल
6) आर्थिक संकट:- W.S.अलब्राइट
7)संसाधनों का दुरुपयोग:- वाल्टर फेयर सर्विस
8) महामारी:- K.V.R. कनेडी
9) घग्घर नदी के बहाव में परिवर्तन:- G.F. डेल्स
10) मोहनजोदड़ो के लोगों की आग लगा कर हत्या कर दी गई:- D.D. कौशाम्बी
11)विदेशी व आर्यों के आक्रमण से:- गार्डेन चाइल्ड, मार्टिमर ह्वीलर, D.H. गार्डन ,स्टुअर्ट पिग्गट


बाह्य आक्रमण:- विद्वान यह मानते हैं कि सिन्धु सभ्यता का अंत आर्यों के आक्रमण के फलस्वरूप हुआ।
इन विद्वानों में मार्टिमर ह्वीलर प्रमुख हैं।इन्होंने अपने मत के पक्ष में 2 कारण बताए हैं।:-
1) मोहनजोदड़ो के ऊपरी सतह पर कई सारे कंकालो  का मिलना जिससे पुराविदों ने यह अनुमान लगाया है कि आर्य ने स्थायी जनसंख्या का व्यापक नरसंहार किया।
2) ऋग्वेद के एक श्लोक में इंद्र की ( CH ) समाधि के दूसरे स्तर से अंत्येष्ठि कलशों में आंशिक शवाधान से लगभग 140 समाधियाँ मिली है।
चाइल्ड की यह मान्यता है कि इन समाधियों के निर्माता आर्य कबीले से सम्बन्धित थे जिन्होंने इनका विनाश किया।


भुतात्विक परिवर्तन:- डेल्स ने सिन्धु सभ्यता के विनाश का मूल कारण भुतात्विक परिवर्तन को बताया है।
जमीन के असंतुलन हो जाने के कारण जहां नदी के प्रवाह में बाढ़ आयी वहीं रेत एकत्रित होने से पानी झील का रूप धारण कर लिया इससे यातायात जल परिवहन में बाधा उत्पन्न हुये और अंतर्देशीय व्यापार का हास्य(पतन) होता चला गया।
लोगो मे पलायन की प्रवित्ति जागृत हुयी और धीरे धीरे ये महान सभ्यता विलुप्त हो गयी।

जलवायु परिवर्तन:- ऑरेल स्टाइल ने सिन्धु सभ्यता के विनाश के लिए जलवायु परिवर्तन को दोषी ठहराया है। ईटो के अत्यधिक उपयोग होने से जंगल की कटाई अन्धाधुंध हुई और पर्यावरण असन्तुलित हो गया। वर्षा की मात्रा कम हो गयी जिसने सिन्धु निवासियों के जीवन के विधि पक्षों को प्रभावित किया यही कारण अंततः सिन्धु सभ्यता के विनाश का कारण बना।
बाढ़ :- सिन्धु सभ्यता के विनाश में एक कारण बाढ़ को भी बताया गया है।
चन्हूदड़ों से भी ऐसे साक्ष्य प्राप्त हुये है कि वहां के निवासियों को बाढ़ के कारण पलायन करना पड़ा था।अतः स्थान परिवर्तन से एक व्यतिक्रम पैदा हो गया। जिससे सभ्यता विनाश के कगार पर पहुंच गयी।

प्रशासनिक दुर्बलता:- उत्खनन के दौरान ऐसे साक्ष्य प्राप्त हुये है जिसमें प्रशासनिक तंत्र की कमजोरी का आभास होता है।

महामारी:-कतिपय विद्वान मरेलिया जैसी किसी संक्रामक बीमारी के कारण सभ्यता का विनाश मानते हैं।
इस प्रकार जीवन को रसमय बनाने के लिए वहां के लोगों ने अनेक प्रकार के शिल्पों की स्मृष्टि की।
इन विशाल नगरो की अपार हलचल इन भवनों की गौरवान्वित ऊँची अट्टालिकाएं नागरिकों के ठहाके एवं कार्य व्यवस्था सब आज अतीत की बातें बन गई।किन्तु भारतीय जीवन पर इनका प्रभाव आज भी अमिट है।

प्रो० चाइल्ड के शब्दों में," इतिहास पर व्यापक दृष्टि डालने पर हमें मालूम होगा कि सम्पूर्ण मानव जाति और उसकी समाजिक व्यवस्थाओं के कुछ मौलिक लक्ष्य होते हैं।जो हमारे विचारों को अवरन्त किये रहने वाले अंतरों अधिक प्राथमिक है और फिर भी यह अंतर स्पष्ट है।



धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलाहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

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हड़प्पा सभ्यता , सिन्धु घाटी की सभ्यता , 

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